कुछ मोती कुछ सीप | Kuchh Moti Kuchh Seep
श्रेणी : कहानियाँ / Stories

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
156
श्रेणी :
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लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :
अयोध्याप्रसाद गोयलीय - Ayodhyaprasad Goyaliya
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लक्ष्मीचन्द्र जैन - Laxmichandra jain
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)कुछ मोती कुछ सौंप
पश्ु-पक्षी-सम्मेलन
नुप्योकी नित नई करतूतोसे तग आकर पक्षु-पक्षियोके प्रतिनिधि
नेपालके एक बीहड वनमें इकट्ठे हुए। कोयलके मधुर गीतके बाद
कागराजने चाहा कि सम्मेलनके अध्यक्षपदको सिहराज सुशोभित करे
कि सिह गरजकर बोला-- कागराज । तुम मानव-ससारमे रहते-रहते
मनुष्य बनते जा रहे हो। वरना इस तरहकी बात न कहते। ध्यान रहे
यह पणु-सम्मेलन है। अपने समाजमे कौन छोटा कौन बडा ? यहाँ सब
एक समान हं 1
सिहकी वात सभीको पसन्द ग्राई। पञ्यु-पक्षी गरदन हिला-हिखाकर
सिहराजके इस विचारकी सराहना करने रुगे । कागने क्षमा मांगते हए
कहा--“सस्कारवडा मुभसे सचमुच भूल हुई । सुभे इसका खेदं ह । लेकिन
में आपको विव्वास दिलाता हूँ कि में मनुष्य हरगिज-हरगिज नही हूँ और
न कभी होनेकी कोशिश करूँगा।
कागराजके इस नम्नर व्यवहारसे पशु-पक्षी वहुत प्रसन्न हुए। कोलाहरू
ग्और कलरव शान्त होने पर तोतेने कहा---
“हमे पश्ु-पक्षियोकी भलाईकी बाते सोचनी है । इसलिए जो भाई-
वहन उपयोगी सुझाव देना चाहते हैँ, सम्मेलनमे पेश करें। समर्थन और
अनुमोदन होनेके वाद सम्मेलन उसपर विचार करेगा।”
तोतेकी बात सुनकर गजराजसे न रहा गया। वह तनिक आवेश
भरे स्वरमे बोला--तोता राम, तुम केवर मनुप्यो-जैसी वोली ही नही
चोलते ! हर वातमे उनकी नकर भी करते हौ ! तुम यह् विस्वर भूर गये
कि हम जहाँ बेठे हुए है, वहाँ मनुप्यो-जैसी नक्लो-हरकत करना पाप हैँ 1
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