कुछ मोती कुछ सीप | Kuchh Moti Kuchh Seep

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Kuchh Moti Kuchh Seep by अयोध्याप्रसाद गोयलीय - Ayodhyaprasad Goyaliyaपंडित लक्ष्मी चंद्रजी जैन - Pt. Lakshmi Chandraji Jain

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लक्ष्मीचन्द्र जैन - Laxmichandra jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कुछ मोती कुछ सौंप पश्ु-पक्षी-सम्मेलन नुप्योकी नित नई करतूतोसे तग आकर पक्षु-पक्षियोके प्रतिनिधि नेपालके एक बीहड वनमें इकट्ठे हुए। कोयलके मधुर गीतके बाद कागराजने चाहा कि सम्मेलनके अध्यक्षपदको सिहराज सुशोभित करे कि सिह गरजकर बोला-- कागराज । तुम मानव-ससारमे रहते-रहते मनुष्य बनते जा रहे हो। वरना इस तरहकी बात न कहते। ध्यान रहे यह पणु-सम्मेलन है। अपने समाजमे कौन छोटा कौन बडा ? यहाँ सब एक समान हं 1 सिहकी वात सभीको पसन्द ग्राई। पञ्यु-पक्षी गरदन हिला-हिखाकर सिहराजके इस विचारकी सराहना करने रुगे । कागने क्षमा मांगते हए कहा--“सस्कारवडा मुभसे सचमुच भूल हुई । सुभे इसका खेदं ह । लेकिन में आपको विव्वास दिलाता हूँ कि में मनुष्य हरगिज-हरगिज नही हूँ और न कभी होनेकी कोशिश करूँगा। कागराजके इस नम्नर व्यवहारसे पशु-पक्षी वहुत प्रसन्न हुए। कोलाहरू ग्और कलरव शान्त होने पर तोतेने कहा--- “हमे पश्ु-पक्षियोकी भलाईकी बाते सोचनी है । इसलिए जो भाई- वहन उपयोगी सुझाव देना चाहते हैँ, सम्मेलनमे पेश करें। समर्थन और अनुमोदन होनेके वाद सम्मेलन उसपर विचार करेगा।” तोतेकी बात सुनकर गजराजसे न रहा गया। वह तनिक आवेश भरे स्वरमे बोला--तोता राम, तुम केवर मनुप्यो-जैसी वोली ही नही चोलते ! हर वातमे उनकी नकर भी करते हौ ! तुम यह्‌ विस्वर भूर गये कि हम जहाँ बेठे हुए है, वहाँ मनुप्यो-जैसी नक्लो-हरकत करना पाप हैँ 1




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