मुक्तिका | Muktika

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संवंरण ४1४४३ (४) अब जब सखझाशा की इसने, तरुण पृत्र का गूजा यह स्वर- प्याय और अन्याय उभय का इन्द्र आज भी हैं अजरामर ! (५) में भी मानव हूँ, अब में भी तरुण हुआ, माँ, मुझे विदा पिता गए थे जिसपर, में भी जाऊँगा अब उस बलिपथ पर [” (६) सुनकर उठी, आज फिर इसने वजद्ध रख लिया अपने उर पर ; रोके आँसू, गत पति की स्मृति; विंदा किया सुत वीर सजाकर । (७) देख रही यह शुन्य दृष्टि से--- बलिपथ सम्मुख , सुत है पथपर ! देख रहे हो तुम इसको श्रो केविं के उर के करुणाकर ! (८) हं यह्‌ कठिन परीक्षाक्षण, तम द्रवित न होना इस अवसर पर ! धय न इसका बहे तुम्हारी करुणाकालिन्दी में मिलकर !




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