संसार का संक्षिप्त इतिहास (द्वितीय भाग) | Sansaar Ka Sanshipt Itihas Vol-2

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जीसस के उपदेश ९ केई विशेषाधिकार न थे | न दप था, न असमानता थी, न कोई हेतु वा प्रयोजन था और न कोई पुरस्कार | फिर यदि भानव-समाज इन उपदेशों की ज्योति से चोधियाकर अन्धा हो उनके विरुद्ध हो गया तो आशचय क्या है! शिष्यों को क्षमा न कर जब वह इस प्रकाश में खींचते ये तो वह भी इस ज्योति से घबड़ाकर चिल्ला उत्ते ये (पिर शरीरो की तो कथा ही कया है )। फिर पुरोहितों के अपने और जीसस के विरोध में यह प्रतीत होने लगा कि श्रव हमारी पुरोहिताई और इस पुरुष के झड़े में एक का नाश श्रवश्य होगा, दोनों जीवित नहीं रह सकते तो इसमें भाशचर्य की वात म्या ह ! फिर यदि रोमन सैनिकों ने शनातीत, अद्भुत एवं अपनी सामाजिक-व्यवस्था के अव्यवस्यित करनेवाले उपदेशों के सुनकर जङ्गलियों की भति रहास कर अपने चित्त के! ढाढस दी और उनके! लाल कपड़े पहिना उनके शिर पर काँटों का ताज रखकर सीज़र का खाँग भरा तो अचरज की फैन बात है ! जीसस के उपदेशों पर गम्भीरतापुवंक विचार करने से तो दूयत एवं भयङ्कर रीति से भीवन নিরানা पड़ता, पुराने समाव को छोड़ना होता, इन्द्रियों तथा मन को वश में करने की आवश्यकता होती भर अनन्त सुख तथा ऐश्वर्य तक के तिलाज्ञि देनी पड़ती . ,... |




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