प्रेम सुधा [भाग १०] | Prem Sudha [Bhag 10]

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Book Image : प्रेम सुधा [भाग १०]   - Prem Sudha [Bhag 10]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सद्भाव-प्रत्याख्यान उपस्थित महानुभावो ! शास्त्र मे उल्लेख है कि शिष्य ने गुरुदेव से प्रघतत किया-- सन्भावयच्चक्खाणेण भते ! जीवे कि जणयद्‌ अर्थात्‌ -हे गुरुदेव ! सद्भाव का प्रत्याख्यान करने से जीव को क्‍या लाभ होता है किसी चीज के अस्तित्व को सदुभाव कहते है और न होने को अ्रभाव कहते है । तो यहाँ सद्भाव के प्रत्याख्यान से क्‍या लाभ होता है, यह प्रइन किया गया है। किन्तु सदभाव तो जीव, अ्रजीव आदि नौ ही तत्त्वो का, विश्व के समस्त पदार्थों का है। दूसरे शब्दों में धर्मास्ति आदि छहो द्रव्यों को विश्व मे सदुभाव है । तौ क्या शास्त्रकार सभी पदार्थों के त्याग का विधान कर रहे है” जब सद्भाव का त्याग कर दिया जायगा तो फिर शेष क्‍या रहेगा ? सज्जनी ! इन्हीं वातो को समभने की आवश्यकता है। सभी वस्तुओ का सदभाव है तो उनका त्याग करने का श्रर्थ क्या ? और हमारे त्याग करने से उन वस्तुओ का बनता-विगडता क्या है? सभी सद्भाव वालो वस्तुओं का त्याग सभव भी केसे है ? क्या सवर, निर्जरा आर मोक्ष का भी त्याग कर दिया जाय ? दरीर का भी वोसिरामि' कर दिया जाय ? ` जिस पदाथं का जो स्वभाव है, वह उससे प्रथक्‌ कदापि नही हो सकता । ्रात्मा मे भ्रात्मभावी जिन चीजो का सद्भाव चला




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