जीवन और विचार | Jeevan Aur Vichar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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~ १७ -- मदर भाव धारा के साथ बढ़ता रहता है । हास्यरस, करुणरस और वीररस तथा शान्तरस सभी रसों की अभिव्यक्ति आपकी वाणी में सहज होती है, उसके लिए आपको प्रयत्न नहीं करना पड़ता । इसलिए जनता आपको वाणी का जादूगर कहती है । वक्तृत्वे कला वापका सहन स्वमाव है। आपकी वाणी 59661 में भरृदुता, मथुरता और सहज सुन्दरता है। भावों की लड़ी, भाषा को झड़ी और तक्कों की कड़ी, कुछ इस प्रकार से जुड़ती है, कि सुनने वाला श्रोत्रा अपने में खो जाता है । कआषापकी वाणी के इस जादू ने ही आपको स्थातकवासी समाज का एक लोकप्रिय नेता बना दिया है । किस समय क्या बोलना, कैसे बोलना और कितना बोलना बस, यही आपकी वक्तृत्वशक्ति का जादू भरा प्रभाव है, जिससे आप समाज कं मार्यदर्शक वन गए हैं। जहाँ-जहाँ पर आप गए, आपका जय-जयकार होता गया । आपकी मथुर एवं जादूभरी वाणी का प्रभाव केवल सामान्य जनता तक ही सीमित नहीं था, बड़े-बड़े राप्ट्र नेता भी आपकी वाणी के जादू से प्रभावित थ | जब पूज्य मालबकेशरीजी महाराज मद्रास और बैंगलोर की ओर विहार कर रहें थे, तव उस समय के काँग्रेस नेता राजगोपालाचारी भी आपसे मिले थे | आपने उस समय विशाल जन-मदिनी के समक्ष जो भाषण दिया था, यह्‌ না क्रे पत्रों में प्रकाशित हुआ था, उसका कुछ अंश मैं यहाँ पर पाठकों की जानकारी के लिए दे रहा हें-- “दान्तमूर्ति, प्रसिद्ध वक्ता पूज्य सौभाग्यमलजी महाराण ने अपने गोजस्वी भाषण में अहिसा और अनेकान्त के वर्णन करते हुए जैन आगमों के आधार पर राष्ट्र धर्म की विशेष व्याख्या की थी । इसके अतिरिक्त एकता, स्वदेशी वस्तु, मादक वस्तुनो का व्याग, हरिजन समस्या ओौर राष्ट्रंभापा की एकता पर बल दिया था। भाषण इतना प्रभावशाली, ओजस्वी और मधुर था, कि वहाँ उपस्थित जनता ने वहाँ के उस समय के मुख्यमन्त्री चक्रवर्ती राजगोपाचार्य से आग्रह किया, कि आप तामिल भाषा में इसका अनुवाद करके सुनाएँ । जनता की माँग को इन्होंने पूरा किया । फिर स्थान-स्थान पर नगर-नगर में, ग्राम-ग्राम में प्रसिद्ध वक्ताजी महाराज के भाषणों की एक भड़ी सी लग गई, जिसमें हजारों-हजार की संख्या में जनता उनके आध्यात्मिक:




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