गृह - नक्षत्र | Grih Nakshatra

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Grih Nakshatra by श्री जगदानन्द राय - Shri Jagdanand Raiश्री जनार्दन झा - Shri Janardan Jha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बैठता है उसी तरह क्या भी झाकाश के ऊपर प्रस्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इसे दम लोग झ्रपनी आँखों से देखते हैं किन्तु पण्डित लोग कहते हैं कि दम लोगां की यदद समझ ठीक उलटी है। वे कहते हैं सूय शार तारे ते झाकाश में स्थिर खड़े हैं हमारी प्रथिवी दी लू की भाँति घूम-घूम कर एक गोलाकार पथ से सूर्य के चारों श्रोर परिक्रमा देती है । इसी कारण से सूर्य और तारों का उदय- अस्त देखा जाता है । मालूम होता है यह बात तुम्हारी समझ में भली नहीं आई । अच्छा मान लो तुमने सूये होकर एक जगह स्थिर खड़े हो अपने मित्र घरणीघर से कहा-- तुम मेरे चारों ओर घूमो । धघरणीधर तुम्हारे श्रार घूमने लगा | श्रब तुमने उससे कहा-- नहदीं यह ठीक नह्दीं हुआ ।. तुम स्वयं घूमो श्ौर घूमने के साथ-साथ मेरे चारों श्रोर चकर लगाझ |? घरणीघर का इस प्रकार घूमने में बड़ी घुमनी लगी ते भी तुम्द्दारे कथनाजुसार स्वयं घूमते-घूमते तुम्हारे चारों श्रोर घूमने लगा आर तुम बीच मं स्थिर भाव से खड़े तमाशा देखने लगे । दर इस घुमनी परिभ्रमण खेल से स्पष्ट ज्ञात दाता है कि. तुम स्थिर हो सिफ़ घरणीधघर ही घूम रहा है । ज्योतिषी




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