खड़ी बोली कविता में विरह वर्णन | Khadi Boli Kavita Mein Virah Varnan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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~< = --- ---- <~ তি काव्यं प्र >> = = [न ८२०-हिद्ा का वातल्सल्य रस से चबद्ध काव्य प्रथम करट का ठ; [जनके प्ररकन्द्र 1 च = विकता [লি ০ दता শিক ২ লাক্লক্স্র ~~ अनिद्यमून्जानठ्‌ 1 त्वानाठक्ता एव ।चत्नेमयता उच्च कठ्‌ क লাতিন্হ-ন্াল के आनकाय ইলম ও ¬~ पं वालनल्य वर्मन चत > ৯ ---> => पष्टनम न्प = ~> =तत्व ट्‌ । नर्‌ क वात्तल्य-उगाच লন হালা नन्व ক্লে দু र्प में विद्यमान प ~ = > ॐহা হি<~ साहित्य न्ध रिद विद्वान সা 'লীলাল = शर्मा < = ~> ठीक সৃহন্াহিতনি ক লুসালিভু पवद्रान उक्र मं जाराम यमान उक“वात्सल्य रस की पुग ब्रातिप्ठा करते का क्षय तो महात्ना सूस्दास को ही दिया जान-प्रेम के अतिरिक्त मित्र प्रेम তরল प्र उर-प परेन ठन त्रे =सतान-प्रम के आतारक्त मित्र-प्रम, बन्धु-श्रम, युदय, ठन -प्रम, उज्वन्‌-प्॑सइत्यादि भी रस-दमा तके पहुँच सकने वाल महाव नाव ই | उनासन च ভিনमेमोरियनम शीर्षक হল में अपने चन्‍्म-नुहृद आयेर के इेहावफान पर जो करना = [9 জি হুলহঘ कि টি হাতল =॥ इच्छित टं दै. दानी ने अपने मुर मालित के निघन के লা জী विध्द प्रेम-स्ट्रूति एवं कन्गा यादेगारे-गालिव! में व्यक्त की हैं. “विभावानुभावव्यभित्रारि संबोगाद्रसनिष्पत्ति:* की हप्टि से भी रनदवा तक पहुँच सकते में-नह॒ज समय है।मेमोरियस রন आर ১ यादार বা, ০৮ व्यया नज पके “इन मेम्नेरियम ` ओर “यादयारे-यालिए) को विरहेल्यथा माकेनुलक हतंके जरस कर्णा হল के अन्तर्गत झा जाती ह्‌, ल्लु दलारये स्वे नान क्रा उद्ना अनि ने विच्छिन्न नहीं है । नन्टरन करा नास्वीय विविन उने क्रिय नत के अंतर्यत रखेगा ? नूर के कृप्ण का ब्रजप्नेस वह किस न्स के अंतर्गत ज्मा ? ह्रौ क श्रीदामा प्रभूति कृप्णु-सखाओं का विद मित्र-विरह वहाँ क्या स्यान प्राप्तं करेन ?हिंदी का महान भक्त्ति-काव्य दो रूपों नें प्राप्त होती हैं। उसका एक्त रूप संस्तार की क्षशभंगुरता पर दुःख प्रकट करते हुये निद्वति क्ञा ल्वन केन्ता है नुक्ति की ओर ललक भरी हृष्ठि के देखता हैं । किठु यह ক बुरे तथा परिमाण दोनोंहृष्टियों से महत्व पुन ग नही है। हमारे भक्कि काव्य का ~ माग शष्ठ एवं महत्वपूर्ण ग प्टियों मे महत्वपुर्ण नहीं है। हमारे भक्ति काव्य का प्राय: सादा श्वष्ठ एवं महत्वपुर कलेवर ई ~. प्रेम क्षी सक्रिय भावता ने अनप्रारित है, वेदना का रस पीने कलेवर ईदवर के प्रति प्रेम की सक्तिय भावना से अनप्राशित हैं, वंदना का रस पानনি >~ হি गोपिकाओं ~ निवृत्ति-मूनक्त नह्‌! नूर का गापिक्ता्रासंदर्णो एवं घात-प्रतिघातों के रस-पान काभारतीय नः साधना अ साहित्यं ---~ साहित्य ~~ == विन्षताय = पष्ठ হি তিনে १. भारतोय साधना आर सूर-साहित्य; स्रझसाहित्य का विनपषताय, पृष्ठ ৯২1२. नादुयशास्त्र (६)




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