जैनपदसंग्रह प्रथम भाग | Jainpadsangrah Pratham Bhaag

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
98
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)प्रथमभाग । ५७.
जवते आनद-जननि दि परी माई । বলব संशय
विमोह মেলা विलाई । जबतें० ॥ टेक ॥ में हूं चि-
तचिह्न, भिन्न परतें, पर जड़स्वरूप, दोउनकी एकता
सु, जानी दुखदाई। जबतें० ॥ १॥ रागादिक बंधहेत,
অল লু विपति देत, संवर दित जान तासु, देत
ज्ञानताई । जवते ° ॥ २ ॥ सवं खुखमय शिव है तसु,
कारन विधिञ्चारन इमि, तन्त्वकी विचारम् जिन, चानि
खधि कराह । जवते ॥ २ ॥ विपयचाहज्वालतें, द-
द्यो अनंतकारुते स.-धांवुस्यात्पदाकगाद,-तं प्रगति
आह । जवते ॥ £ ॥ याविन जगजालमें न, शरन
तीनकारमें सं,-मारु चित भजो सदीव, दौर यह सु-
हाई । অন্ন ॥ ५ ॥
८भज ऋपिपंति ऋर्पेभेश ताहि नित, नमत अमर
असुरा} मनमंथ-मथ दरसावन रिवपंथ, चरप-रथ-चक्र-
धुरा ॥ भज० ॥ टेक ॥ जाप्रञु गमंखमासपुवे सुर,
कृरी सुवण धरा ! जन्मत सुरगिर-धर सुरगमयुत, दैरिपय न्हवन करा ॥ भज ० ॥ १ ॥ नटत বন্দী নিভু
6 ~ + 0৮१ चिजरा । > स्याद्रादरूपी अग्रृतमे अवगाहन करमेचे } > सुनिनाय 1 ४
অলক ईद आदिनाथ भगवान् 1 ५ कामदेवके मथनेवाले | £ मोक्षपथ 1 ও
इन्द्र | ८ अप्सरा ।শি
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