भूदान गंगा | Bhoodan Ganga

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मुभ्धे हर शख्स की शक्ति चाहि १८ उससे न सिफ़ गरीवो को, वल्क हिन्दुम्तान के श्रीमानों जो भी समाधान होता है कि वावा हमारे हृद्य की वात बील रहा है । हिन्दुस्तान के बाहर के लोगों को लगता है कि यह वारा मॉगता फिरता है; तो लोग केसे देते हैं ? हिन्दुस्तान के लोग इमीलिए, ठेते ह कि उन्हे खुशी होंती है। लोग प्रछेंगे कि इतना आप मारत का गोरव गाते है, तो कितने लोगों ने आपको ठिया ? हम कहते है कि जितने लोगों के पास हम पहुँचे, उतने लोगों ने व्यिा ) हम सब्र लोगो के पास पहुँचे हो कहों हैं? हमारा विश्वास है कि यह संदेश अगर हिन्दुस्तान के कोने कोने मे पहँच जाय, तो जैसे चार महीने मे कुल हिन्दुस्तान मैं बारिश होती है, वेसे ही चार महीने में कुल हिन्दुस्तान में पाँच करोड एकड जमीन हासिल होंगी। बात सिफ यहाँ रुकी हुई है कि लोगो के पास पहुँचना बाकी है। मुझे हर शख्स की शक्ति चाहिए ! जिस विश्वास से तेलगाना में भूठान का आरम्म हुआ, उसमे शंका का स्थान था | मेरे मन में इतना विश्वास नहीं होता था | लेकिन जो श्राटेश मिला, वह स्पाठ था। में नहीं कह सकता कि वह विचार मेग था। इसीलिए मेने कटा कि मुझे পাইয়া লিলা খা 1 লই লন मैं तो क्रिकक थी, हिचिक थी। लेक्नि टिन-ब-दिन सिद्ध हुआ कि जिसने आदेश दिया, उसने सभी बाते हमारे सामने रखीं ओर मैने तो श्रद्धा रखकर ही काम क्रिया । लेकिन में विश्वासप्रवंक कहता हैँ कि भारत का हृठय पूर्ण-कुभ है। वह पूर्ण भरा है। मुझे उम्मीद है कि जितनी उदरता को आशा मेने आपसे रखी है, उतनी आप अवश्य दिखायेंगे ) म सिफे मृटान के लिए नदीं श्राया, मुभे टर शख्स की शक्ति चाहिए। जिसके पास জী हो, वह चाहिए | यह गलतफहमी न रदे कि टम सिफ भूमि मांगते टं 1 ग्रापकरो अपनी सपत्ति और अपने अम का भी हिस्सा देना है ओर ठेते ही रहना है वातीली ( श्रीकाङ्कलम्‌ > १-१०-५५




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