मील के पत्थर | Meel Ke Pathar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १० ) मनुष्यों के पास हैँ, उन्हें कलात्मक श्रभिव्यक्ति द्वारा सबल अथवा दुर्वंल किया जा सकता है । बुद्धिमत्तापूर्वंक विचार करने के लिये आवश्यक है कि हम दोनो संदिलष्ट समस्याओ्रों को पृथक कर लें, और प्रत्येक का विचार क्रमश. करें । हमे यह ध्यान रखना चाहिए ,कि नेतिक आदर्शो का महत्व कला के स्वभाव और प्रभाव को समझने में बाधक न बने । नेतिक आदर्शो को कला की राह मे सबसे बड़ा अवरोध इतने अधिक समय से माना जाता रहा कि यह तथ्य शीघ्र नही समझा जाता (विश्येष कर उनके हारा, जो मात्र आनंदोपभोग के निमित्त कला का ध्यान कर लेते हे) कि कला किसी भी प्रकार की भावना को गतिशील कर सकती है, और इसलिए अपने को किसी धामिक-अ्रधामिक विचारधारा से संबद्ध कर सकती है । शुद्धिवादी (1309109) कला से इसलिए घृणा करते थे, क्योकि वे जानते थे कि गिरजाघरों और पूजास्थलों के सौदर्य एवं सगीत उस प्रतिष्ठित घर्मं को बनाए रखने में सहायक हुए हे जिसके वे विरोधी हे और इसीलिए उन्होंने तत्परतापुर्वक गिरजाघरों की मूर्तियों की नार्के काट डाली । यह समझने मे उन्हें बहुत समय लगा किं वक्तृत्व मे, व्यग्य मे, ग मे, पद्य मे, भजनो मे कला उन्हे अमूल्य सहायता दे सकती है । कला के ही द्वारा कला के प्रभाव का सफलतापूर्वक सामना किया जा सकता है, और टाल्स्टाय के सिद्धान्त मे ऐसा कुछ भी नही है जिसे अस्वीकार करना किसी विवेकशील व्यक्ति के (लिये जरूरी हो, भल्रे ही टाल्स्टाय के आचार-शास्त्र से तथा उन उदाहरणो से वह सहमत हो था असहमत जो उसने कलाकृतियो से दिये हँ जिन्हें वह श्रेष्ठ समझता है। इन कलाकइृतियो के “वस्तु तत्व' को, अर्थात प्रेषित भावनाओं की प्रकार-श्रेष्ठा को उसने अच्छा समझा है । ৃ यहां मेने कला कया है' पर अपने विचार व्यक्त किए हे, क्योकि श्रव तक इस विषय पर टाल्स्टाय द्वारा लिखित सामग्री में यह निवंध सर्वाधिक महत्व का एवं पूर्ण है । अन्य निवध तो प्रमुखत: इसलिए मृल्यवान्‌ हे क्योकि या तो वे प्रतिपादित सिद्धांत को समझने के प्राथमिक सोपान हे अ्रथवा उसके पूरक प्रयोग 1 'स्कूलो के छात्र और कला' में उस अनुमव की झाँकी मिलती है, जिसके कारण टाल्स्टाय यह जान सके कि कृषक वालक कला को समझ सकते है, और यदि उनके पथ से यात्रिक वाघा दूर कर दी जाये तो वे स्वयं कला की सूप्टि




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