धर्म और दर्शन | Dharm Aur Darshan

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Dharm Aur Darshan by देवेन्द्र मुनि शास्त्री - Devendra Muni Shastriश्री पुष्कर मुनि जी महाराज - Shri Pushkar Muni Maharaj

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देवेन्द्र मुनि शास्त्री - Devendra Muni Shastri

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श्री पुष्कर मुनि जी महाराज - Shri Pushkar Muni Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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घर्मं और दशन छ मन को जो भी अभिराम प्रतीत होता है, वह सब धर्म का ही फल है # इस कथन से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्म का सम्बन्ध न केवल आध्यात्मिक श्रेयस्‌ से है, अपितु हमारे वर्त्तमान जीवन के साथ भी है । घर्मव्याख्या धर्म शब्द का व्याकरण शास्त्र के अनुसार अर्थ है--घारण करना 1 जो घारण करता है वह धम है ।* 'घृत्र' घातु मे मत्त या “म” प्रत्यय जोडने पर 'धर्म' शब्द निष्पन्त होता है। जो दुर्गतिपात से प्रारियो को बचाता है, वह घम है | कणाद के कथनानुसार जिससे अभ्युदय ९ भम्मेण बुलप्यमूदइ धम्मेण य दिव्वरूवसपत्ती। धम्मेण धणसमिडी, घम्मेण सुवित्यडा वित्ती॥ धम्मो मगतमखल, ओक्षहमउल च सव्वदुक्लाणा । धम्मो यलमवि विउल, धम्मो ताणद सर्णच॥ कि जपियण बहुणा, ज ज दीसइ सब्वत्य जियलोए । 181 मणाभिराम, ते तत धम्मफल सव्व ॥ --समराइच्चकहा ६ धारणाद्‌ धममित्याहु (त) धारणाद्‌ धम उच्यते 1 महाभारते, कण पव ७ धूमे धारणो, स्प धातामत्‌ प्रत्यया तस्येद र्पम्‌ धम इति) --ददावं* शिन० घूणि ঘুণ १४ ८ धृणष धारण, इत्पश्य धातोमप्रत्ययाम्तस्येद रुपम्‌ घम इति । --दणवे० हारि० टश्च, पचर २० ६ गस्मार्जीष रक्तियम्पानिवुमानुषदेवत्वषु प्रपतेत धारयतीति धम, उक्वञ्प~- दुमतिप्रसृतान्‌ जीवान्‌, यस्माद्‌ धारयते ठत 1 धपे ततान्‌ शुमस्यानं तस्माद्‌ धमं इति त्यत ॥ --रगवं° जिन० पूणि० प० १४




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