हिन्दी-अलंकार-साहित्य | Hindi-Alankar- Sahitya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संस्कृत-अलंकार-साहित्य ५, दृष्टि वैयाकरणो पर ही जमी (दे० संस्कृत पोदरिक्स, प० ८, तथा भारतीय साहित्य- रास्व, पु ° १८) ; पुराने सभी सिद्धान्तो को ठलकारने वाले आनन्दवधेन ने व्याकरण को सब विद्याओं का मूर १ माना और वेयाकरणों को सर्वश्रेष्ठ विद्वान्‌ कहा । संसत के प्राच्य विद्वानों में आज भी व्याकरण का तथेव आदर ह । अस्तु अलंकार-शास्त्र' से पूर्व अलंकार! और अलंकार से पूवेतर उपमाः (सा- दृश्य} का प्रकल्प वेद तथा भाषा दोतनों में प्रतिष्ठित हुआ था । किस अलंकार का जन्म (आदि प्रयोग ) तथा विवेचन किसके द्वारा हुआ--यह भी रोचक अध्ययन का विषय है । अलंकार' का शास्त्रीय रूप में प्रथम दर्शन भरतमुनि के नाट्चशास्त्र में प्राप्य हे, फिर भी भरत रस तथा नाट्य के समान अलंकार के भी आदि आचार्य नहीं हें; और भरत के युग में अलंकार' का शास्त्रीय अर्थ स्थापित हो चुका था या नहीं--यह विचारास्पद है । अलंकार की दृष्टि से अलंकार-शास्त्र' का, उपलब्ध सामग्री की छाया में, विधिवत्‌ प्रारम्भ भामह के काव्यालंकार' से आरम्भ होता हैं। भामह से आनन्दवर्धन तक के काल में अलंकार' के अतिरिक्त गुण तथा रीति भी काव्य-सौदयं के मुख्यरूप स्वीकार किये गये; भामह, दण्डी तथा वामन के नाम क्रमशः अलंकार, गुण, तथा रीति के आदि आचार्यों के रूप में स्वीकृत किये जाते हैं । फिर आनन्दवर्धन ने ध्वनि को काव्य की आत्मा सिद्ध किया, फलतः उपर्युक्त तीनो प्रकल्पो की गति स्तब्ध हो गई ओर इतर आचायं ध्वनि के निरसन में या उसके प्रख्यान मेँ खग गये; आनन्दवधेन ओर मम्मट के बीच कां युग एतादृश ही ह; ध्वनि के निरसन में वक्रोक्ति के प्रख्यात आचाय कुन्तक का नाम स्मरणीय हं । मम्मट से पण्डितराज जगन्नाथ तक रस तथा अलंकार दोनों का ही पार- स्परिक विरोधपूवेक शासन चरता रहा । अरकार' की दृष्टि से अरुकार-शास्व' के संस्कृत आचार्यो का अध्ययन निम्न- लिखित तालिका द्वारा संकेतित किया जा सकता है-- १. उपक्रम--अलंकार; ऋग्वेद में; निरुक्‍त में, २. भरत से पुवे--वेयाकरणों मं २३. भरत-- ४. भामह से आनन्दवधेन तक--भामह, दण्डी, उद्भट, वामन, खद्रट, अग्नि- पुराणकार । ५. आनन्दवर्धन से मम्मट तक--आनन्ववधन, राजशेखर, अभिनवगप्त, कुन्तकः, क्षेमेन्द्र, भोज । ६. मम्मटः से जगन्नाथ तक--मम्मट, रय्यक, टैमचन््र, वाग्भटू दय, जयदेव, विद्याधर, विद्यानाथ, विदवनाथ, के्ञवमिश्च, अप्वयदीलित, जगन्नाथ । (१) प्रथमे हि विद्वांसो वेयाकरणाः व्याकरणम्‌ लत्वात्‌ सवंविद्यानाम्‌ । . (ध्वन्यालोक, १, १३) । (२) सम एसपेक्ट्स ऑफ लिटरेरी क्रिटिसिज़्म इन संस्कृत; पु० १८।




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