नागरिक शास्त्र के सिद्धान्त | Nagrik Shastra Ke Siddhant

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नायरिक शास्त्र को परिमावा, क्षेद, दिवियां और उपयोगिता ११ (५) पवदौ बात यहे है वि नायरिव वितानं क अध्ययन दा याजों वे लिये बडा मटत्दहे! माजकेष्ठकरहुर क्लब नागरिक होगे । सागर विज्ञान दी जातकारी उन्हें हीक तरह बा नागरिव ददने में मदद देती है। नौजवाद हो विसी राष्ट्र वी यारा होते है। बुछ वर्ष बाद वे ही नागर बनड़र इसे भाग्य दिधाता होगे। राष्ट्र की दिनि उने चरि और शिया पाए निर्भर हूं। इसलिए नोजवानों को अपने बारी को शिश्वि भरना, अपने दियाग कं योग्य वनाना आर अपने चरित्र था दिवास करता जरदी शुरू गर देना चाहिए जिससे वे देय म सामने भाने दान अनेत समस्याओं रो हु कर से । नागरिक विसात उतरे सयसतें नागरिकता और सुखी समाज, इन दोतो के जरूरी आाइयें पेश करता है। हमारे देशवासियों के ह्रे नापरिक विहान का महूप्व यदपि भारत वा आगार, जयादौ जर सापन वदटुन येह, तो भी यदि उसकी तुखना अमसोका, स्म और इगलंण्ड अंसे भागे बड़े हुए सुम्रों में की जाये ता बह बहुत पिछड़ा हुआ है । उपदों पिछड़े होने बा एक बयरण यह हैं कि उसते सदियों की गुलामी के वाद अभी हाल में आजादी हामिल की हैं । यर साय ही हम अपनी समाज वी गहरी शुराइयों में बाखें नहीं मीच सकते 1 हमारे अन्दर नागरिक दुद्धि की बहुत वर्म! है। शाम्पदाधिवता, प्रान्तीयता, जेहाहत, गरीबी और खराव तन्दुराती हमारी कुछ मोटी चुराइपो में से हूं। जाति प्रथा, छूआाएूत, स्तरी-ुस्प या भेदभाव और दहण प्रथा जंसी दुराइया हमारे देश में बीज भी पैछी हुई हैं । हमारे अन्दर वह चरित्र नह्दी थी स्वत्त्र लोगतन्त्रीय देस वे नागरिकों में हुआ बरता है । खुदगर्जी, वाहिली, बड़ों का हुक्म न भावना , आगे बडे से भय ओर जिम्मेदारी को भावना की कमी, हमारे चरित्र की कुछ मोटी विशेषत्ताए हूं। अगर हमारा बस चले तो हम टेवस ता अदा बरनें ही नहीं और बसा न बरने पर फर भी नरम हं। हम रोज सरकार का गाली देंतें हैं वि उसने भदक रामराञ्य नहौ बनाया ओर श्वय उसके स्वि कोद काशिरा नहीं रने। यदि उपर करी गई सय नुटियो को ठते दिया जाए तो इसमे हमारी नयी जाजदोषो वषरावेदा हो जाएगा) यदि हमने अपनो षमियो चो महमूषनदौ किया तो खाक्रतन्य का प्रयोग अमफल् हो जायेंगा । हमें अच्छे नागरिव घनने की कोशिश करनी चादिए ओर नागरिक विज्ञान का अव्ययन हेमारौ समस्याए हल करनं मै बहून मदर करेगा 1 ई सारदा नागरिक दार्रको परिभाश सिदिवम दाद्द लैटिन के 'सिदिटत' और 'सिदिम' शब्दों से निकला है, जिनका अये कमदा नियर' और 'नाररिव हैं। इसका पह अर्प नही हूं कि नायस्कि यास्व मनुष्य का सिर्फे नगर वी सदस्य के रुप में अध्ययन करना हूं। आज राज्य नगर में बहुन बढ़ी चीज है और इसलिए नागरिक यास्त्र के अप्ययन का क्षेत्र भी बढ गया है । नागरिव ने केवठ याभ्य दरा सदस्य ह दस्कि गहं सारी मानवं विरादरी कर भी शरू यदस्य हैं। इस




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