अजन्ता की ओर | Ajantaa Kii Or

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अजन्ता की ओर ७ ११ठहाके एक भयानक्र शोर बनकर गूँजते हे, और उसकी आँखेकि सामने उस बृढ़ेकी सफ़ेद दाढ़ी, जो स्वयं उसके अपने खुनसे से गई थी, एक:- भयानक ब्रवंडर बनकर फड़फड़ाती रही, और उसे ऐशा प्रतीत हुआ कि. सारे भारतकी स्त्रियां किसी ऐसे भयेक्र ख़नी मज़ाक्पर हँस रही हैं जो उसकी समभसे बाहर है !भारतीय नारियोंकी वास्तविक प्रकृति ! उनको आत्माकी शान्तता {` उनकी कोमल्ता ! उनकी ममता |निर्मल के बहुतसे मित्र मुसलमान थे, किन्तु दंगेके दिनोंमें वह उनके मुइर्लोमें नहीं जा सकता था | एक दिन उसे मालूम हुआ कि उसके. साथी रिपोर्टर और मित्र हनीफ़को सख्त बुखार और सरसाम हुआ है । লিল ने रहा गया और वह हिम्मत करके भिन्‍्डी बाज़ार पहुँच ही गया, जहाँ एक चालमें इनीफ़ अकेला रहता था |क्राफोडे माकैटपर सिवाय निर्मलके सरे दिन्द्र बससे उतर गए | वह कोट-पतलून पहने हुए. था और उसकी वेश-भरूषासे यह ` बिलकुल पता न चलता था कि वह हिन्दू है या मुसल्लमान या ईसाई। रंग भोरा होनेके कारण तो वह पारसी ही दिखाई पढ़ता था, किन्तु फिर भी जेसे- जैसे बस बम्बईके ध्याक्षिस्तानी? इलाकेमें जा रही थी, उसका हृदय भय : ओर परेशानीसे धड़क रहा था| एक बार तो उसे ऐसा लगा कि उसके बराबर बैठा हुआ हृहा-कह्ा शुन्डानुमा मसलमान घुवक उसके हृंदयकी घड़कन सुनकर समझ जाएगा कि यह हिन्दू है ओर अपनी जाकेदमेंसे छुस निकालकर उसकी कमरतमें भोंक देगा, उसी प्रकारः जेते चरनी रोडपर उस. दुबले-पतनज्ञे युबकको एक हिन्दू शडेने यलतीः से मार डाला था | चौर एकाएक न जाने क्‍यों उतकी कमरमें, रीढ़की हडुके पास, खुरली- महसूस होने लगी; और एक काव्पनिक चाकुका तेज़ फल उसकी पसलियों म जसे सता चला गया ।बारल्लीवाला अस्पतालके पास वह बससे उतरकर पसी-प्यी चला,




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