युद्ध - यात्रा | Yuddh Yatra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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युद्ध-यात्ा ः यहाँ का ता सारा दृश्य ही बदल गया था | घिपू ' घपू ......ठपू....ढपू, . ८” दूसरी झोर से--“मच...मच...हुमच ...हुमच...' कहीं कहीं से--'मार्च | मार्च !” बीच-बीच में ककश स्वर में--'लेफ़ट. . .राइट...! दाँयें घूम ! आगे. . ब्रेनेरो की पहाड़ियों में चारों तरफ़ से यही आवाज़ । जितने लोग दिखलाई पढ़ते सबकी देह पर वर्दी । यदि किसी को पूरी वर्दी न मिली रहती तो उसने आधी, चौथाई वा नाम के लिए उसका एक टुकड़ा ही पहन लिया था । बहुतेरों ने अपनी साधारण पोशाक ही इस ढंग से पहनी थी कि वह दूर से ठीक वर्दी जैसी दीखती | उनके कंधों से राइफल कला करते । दूर से ही, पर ज़रा ध्यान से देखने पर यह भी स्पष्ट हो जाता कि उनमें कितने राईफल नकली वा पिछली शताष्दियों में बने थे । किसी केसी के पास तो वे निरे काठ के थे | आठ वष के बच्चे से पचास वर्ष के बूढ़े तक इस क़वा- यद में शामिल थे ।. ये अलग-अलग टुकड़ियों में माच करते पर कभी-कभी एक साथ हो जाते और चार-चार की कतार में मुख्य सड़क पर आते ।




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