गीता प्रवचन | Geeta Pravachan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहला अध्यायं १५ भरका होता हं । श्रेयान्‌ स्वधर्मो विगणः' इस गीता-वचनमें धमं दाब्दका अथं हिदू-धमं, इस्लाम, ईसादे-धमं आदि जंसा नहीं है । प्रत्येक व्यक्ति का अपना भिन्न-भिन्न धमंह। मेरे सामने यहां जो दोसौ व्यक्ति मौजूद हूं, उनके दो सौ धर्म हें । मेरा धर्म भी जो दस , वषे पहर था वह आज नहीं हुं । आजका दस वषं बाद नहीं रहनेका । चिंतन और अनुभवसे जैसे-जैसे वृत्तियां बदलती जाती हें, वैसे-वेसे पहलेंका धर्म छूटता जाता हं व॒ नवीन धर्म प्राप्त होता जाता है । हठ पकड़कर कुछ भी नहीं करना हू । दूसरेका धमं भरु ही श्रेष्ठ मालूम हो, उसे ग्रहण करनेमें मेरा कल्याण नहीं हू । सूयंका प्रकाश मुझे प्रिय ह । उस प्रकारासे में बढ़ता रहता हूं । सूय॑ मुझे वंदनीय भी है । परंतु इसलिए यदि में पृथ्वीपर रहना छोड़कर उसके पास जाना चाहूंगा तो जलकर खाक हो जाऊंगा । इसके विपरीत भले ही पथ्वीपर रहना विगण हो, सर्यंके सामने पृथ्वी बिल्कुर तुच्छ हो, वह्‌ स्वयं प्रकाशी न हो, तो भी जबतक सूयेके तेजको सहन करनेका सामथ्यं मुझमें न आ जायगा तबतक सूयं से दूर पृथ्वीपर रहकर हो मुझे अपना विकास कर छना होगा । मछलियोंको यदि कोई कह कि पानीसं दूध कोमती ह, तुम दूधमं रहने चलो, तो क्या मछलियां उसे मजर करेगी ? मछलियां तो पानीमं ही जी सकती हैं, दूधम मर जायगी । दूसरेका धर्म सरल मालम हो तो भी उसे ग्रहण नहीं करना हे । बहुत बार सरलता आभासमात्र ही होती हूं। घर-गृहस्थीमें बाल- बच्चोंकी ठीक संभाल नहीं कीं जाती, इसलिए ऊंबकर यदि कोई गृहस्थ संन्यास ले ले तो वह ढोंग होगा व भारी भी पड़ेगा । मौका पाते ही उसकी वासनाएं जोर पकड़ेंगी । संसारका बोझ उठाया नहीं जाता, इसलिए जंगलम जानेवाला पहर वहां छोटी-सी कुटिया बनावेगा । फिर उसकी रक्षाके लिए बाड़ लगावेंगा । ऐसा करते- करते वहांभी उसपर सवाया संसार खड़ा करने की नौबत आ जायगी । यदि सचमुच मनमें वेराग्यवृत्ति हो तो फिर संन्यास भी कौन कठिन बात हे ? संन्यासको आसान बनानेवाला स्मृति-वचन तो हे ही । परंतु खास बात वृत्तिकी हं । जिसकी जो वास्तविक वृत्ति होगी




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