जैनहितैषी | Jainhiteshi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५९भी बहुतसे भट्टारक नग्न होते हैं। इससे यों मुनि ही माठम होते हैं और हमेशासे थे अपनेको मुनि ही समझते आये हैं । ईडरके मंडारमें एक प्राचीन तथा जीणे पुस्तक हैं, उसमें भट्टारक दीक्षाकी विधि लिखी है। उसका थोड़ासा अंश जो हमारे पास पं० नन्दनलाछजी अध्यापक ने कृपाकरके भेजा है, उससे मालूम होता हैं कि, पहिले गृहस्थ या श्रावकको मद्ारककी दीक्षा नहीं दी जाती थी किन्तु किसी योग्य मुनिको तलाश करके उसे भट्टारक पदपर प्रतिष्ठित करते थे । उसे सूरिमंत्र देते थे आर उसमें आचायंके गुर्णीका आरोपण करते थे । इसके सिवाय उसमें भट्टार- कके लिये घमाचायाघिपति, मुनि लब्घाचायेपद, जिनधर्मोद्धरण घीर, आदि विशेषण भी दिये हैं । इससे साफ माठम होता है कि, भट्टारक वास्तवमें राहस्थ नहीं हैं, मुनि तथा आचाये हैं | शोर कम से कम उस पैथके ठोग जिसने भट्टारकोको अपने घमेगुरुक रूपमें स्वीकार किया है, प्रारंभबे अबतक उन्हें मुनि वा आचाये ही मा- नते आये हैं। नन्दिसंघ, सेनसंघ आदिकी जो गुवांवली वा पट्टावढी है, उनमें भी पूर्व गुरुअकी परम्परासि भट्टारकोंकी परम्परा मिलाई गई है ओर उनका जो. नामकरण होता है, वह भी पूव गुरुओंके समान होता है । जेसे गुणचन्द्र, रत्नकीर्ति, वीरसेन, सुरेन्द्रभूषण आदि |भट्टारक दीक्षा विधानसे और भट्टारकोके इतिहासस इस बातका आभास तो जरूर होता है कि, देश काठकी अनुकूलता नहीं हो नेसे ही मुनियों वा आचार्योके स्थानमें भट्टारकोकी स्थापना की गई थी और समाजके बहुत बड़े भागने इस सुधार वा. रिफार्मकों स्वी- कार कर लिया था । परन्तु इस विषयका प्रतिपादन वा. विवेचन




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