निर्दोष कन्या | Nirdosh Kanya

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Nirdosh Kanya by प्रभावती देवी - Prabhavati Deviविश्वनाथ - Vishvanath

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विश्वनाथ - Vishvanath

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(६) से कब प्रयाण कर गए थे इसकी उसे तनिक भी थाद नहीं थी। जब से उसने दोश' सस्माला बह नाना जी के सिवाय ब्यौर किसी को जानती ही न थी । पूर्वी ने विवाहं की रात्री को ही पतित्र की ओर अच्छी तरह देखा था । उसकी अनिंय सुन्दरता को देखकर बह पुलकित हो उठी और अपने को खो येठ़ी और उसी क्षण उसके चरणों पर अपना सर्वस्व अपण कर दिया । विवाह के दूसरे ही दिन पचित्र पूर्वी से यह कह कर चला गयी था कि वह्‌ घर जाकर पित्ताजी से समस्व घटना का वर्णन करेगा ौर फिर पूर्वी को झाकर ले जाएगा । वह चार दिन पश्चात आने का वचन दे गया था, परन्तु चार दिन की जगह दस बारह दिन व्यतीत हो गये फिर भी पथित्र का कुछ पता नहीं था । नातिन की मांग का सिंदूर देखकर ब्रद्ध जलघर दीघें निश्वास रोकने से जव सवथा समर्थं दो गए तो उन्होने पूर्वी से छिपा कर समस्त घटना, क्षमा याचना करते हुए पने समधी को किख भेजी । पत्र भेज कर भी वे निश्चिन्त न हो सके उन्हें सन्देह होने लगा कि कहीं पता लिखने में तो उन्होंने भूल नहीं कर दी ? “पूर्वी बेटी-पवित्र ने जो अपना पता तुम्हें लिख दिया है उसे तनिक मेरे पास तो ले आछो ।” वृद्ध ने पुकार कर कहा । उस समय पूरी चूल्हा जला रदी थी । उसने बाहर आकर पूछा “क्या वत्त है नाना {?




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