सौ अजान और एक सुजान | Sou Ajan Aur Ek Sujan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
138
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)दूसरा प्रस्ताव १९चिकनाते हुए फैशन और नज़ाकत के पीछे जनखा बन
केवल अपने ाराम और भोग-विलास की फिक्र के सिवा
ओर कुछ न करना इसे बिलकुल नापसंद था । न हरदम
खाली सुभिरनी फेरना ही इसे भला लगता था, न यह आलें
पहर अथं-पिशाचं वन केवल रुपया-ही-रपया अपने जीवन का
सारांश मान बैठा था । वरन् समय से धमे, अथे, काम, तीनो
को पारी-पारी सेवता था । व्यासदेव के इस उपदेश कों अपने
लिये इसने शिक्तागुरु मान रक्खा था- ' ।
घर्माथकामाः समतेव सेव्याः
यस्त्वेकसेच्यः स नरो जघन्यः ।%
बुद्धिमान् ओर सभाचतुर एसा था कि जरा-से इशारे मे वात
के ममे को पकड़ लेता था । केवल एक दी मेँ नितांत आसक्ति
न रख धमे, अथे, काम, तीनो मेँ एक-सी निपुणता रखने से
कभी किसी चालाक क जुल में यह नदीं राता था । संसार
के सब काम करता' था, पर जिंतेद्रिय ऐसा था कि कच्ची
तबियतवालों की भाँति लिप्त किसी में न होता था--
शरत्वा दृष्ट्वा च स्पष्ट्वा च शुक्त.वा घ्रात्वा च यो नरः ;
यो न हप्यति ग्लायति वास विक्तेयो नितेन्दियः> ध्म, प्रथं श्रौर काम; इनका समान रूप से सेवन करना चाहिए
जो मनुष्य एक ही का सेवन करता है, वह निंद्य हे ।
1 जो मनुष्य खुनकर, देखकर, छूकर, खाकर और सूघकर न. प्रसन्न
होता है न अप्रसन, उसे जितेद्रिय जानना चाहिए ।
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