प्रमाण नय तत्त्वालोक | Praman Naye Tattvalok

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Praman Naye Tattvalok by शोभाचन्द्र भारिल्ल - Shobhachandra Bharill

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(७) वि [ प्रथम परिच्छेद संशय-समारोप साधकनाधकप्रमाणामावादनवस्थितानेककोरिसंस्पशि ज्ञानं संशयः ॥११॥ यथा--च्यं स्थाणुर्वा पुरुषो वा ॥१२॥ श्र्ं--साधक प्रमाण श्रौर बाधके प्रमाण का श्रभाव होने से, अनिश्चित अनेक श्रंशो को छूने वाला ज्ञान संशय कहलाता है । जेंसे--यह ढूंठ है या पुरुष है ? विवेचन--यहाँ संशय-ज्ञान का स्वरूप और कारण बतलाया गया है । साथ ही उदाहरण का भी उद्लेख कर दिया गया है । एक ही वस्तु से अनेक अंशो को स्पर्श करने वाला ज्ञान संशय है, जैसे ठृंठपन और पुरुषपन दो अंश है । इस ज्ञान के समय न टंठ को सिद्ध करने वाला कोई प्रमाण होता है, न पुरुप का निपेघ करने वाला ही प्रमाण होता हे । ठंठ ओर पुरुप दोनों में समान रूप से रदमे वाली उचाई मात्र मालूम होती हैं । एक को दूसरे से भिन्न करने वाला कोइ विशेष घम मालूम नहीं होता । विपयेय और संशय का भेद--विपयय ज्ञान में एक अंश का ज्ञान होता हैं, सशय मे अनेक अंशो का । विपयय में एक अंश निश्चित होता है, संशय मे दोनों अंश अनिश्चित होते है । झनध्यवसाय-समारोप किमित्यालोचनमात्रमनध्यवसायः ॥१२॥ यथा-गच्छत्तणस्पशज्ञानम्‌ ॥१४॥




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