रवीन्द्रनाथ के नाटक भाग १ | Ravindranath Ke Natak Khand-1

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प्रफुल्लचंद्र ओझा - Prafulchandra Ojha

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हंसकुमार तिवारी - Hanskumar Tiwari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना ११ चनाओ, तभी तुम मेरा परिचय पा सकोगे । ) यह स्वर जिसका है वह पौराणिक नारी नही, सम्पूर्ण रूप से आधुनिका नारी है। इस आधुनिका नारी की कीति तथा कण्ठ-स्वर से परवर्ती रवीन्द्र-साहित्य पूर्ण है। 'चित्रागदा' मे उसका प्रथम नि.संशय आविर्भाव होता है। इसीलिए काव्य- विचार की सीमा के बाहर सामाजिक इतिहास के छ्षेत्र मे भी इस नाटक का अपना एक स्थान है। (08 नाम से अग्रेजी में अनूदित होकर इस काव्य ने लोकप्रियता प्राप्त की है, वह गायद इसी कारण । विदेशी पाठकग ण भारतीय कवि की लेखनी की पौराणिक नारी को देखने की आशा से आकर आधुनिक नारी को देखकर विस्मित हो गए है। चिरकुमार सभा (१६००-१९६०१) प्रारम्भसे ही इस पुस्तक का प्रचलन 'चिरक्रुमार सभा! तथा परजापतिर निवन्ध' इन दो नामो से होता रहा है। इस प्रहमन की रचना सबसे पहले सलाप-बहुल उपन्यास के आकार में की गई थी। बाद में अर्थात्‌ १६२५ के समय पेशेवर रग- मच के आग्रह पर कवि ने इसको सयुर्ण नाटक के आकार में बदल दिया--और तब पेशेवर रगमंच में अभिनीत होकर नाटक ने प्रभूत लोकप्रियता अजित की । यथा्थंत: इसीको रवीच्नाथ के नाठक का प्रथम मंच-साफल्य कहा जा सकता है। दीघेकाल तक निरन्तर इसका अभिनय चलता रहा | उप्तके वाद भी जब कभी इसका अभिनय हुआ दर्शको का अभाव नही रहा । शौकिया नाटक-मडलियाँ तो अब भी अवसर मिलते ही इस प्रहसन का अभिनय करती है। इस लोकप्रियता का क्या कारण है ? प्रथम कारण है नाटक की मूल घटना का रसपूर्ण सहज आवेदन । आदशंवादी नवयुवको के एक दल ने देश तथा समाज को उन्नत बनाने की इच्छा से वि रकुमार रहने की मनोकामना प्रकट की है---और चुपके-चुपके चिरकुमार सभा का एक भृतपूर्वे सदस्य, जो अब स्वयं विवाहित है तथा अपनी दो अविवाहित सालियो की शादी के विपय मे उद्विग्त है, उनका ध्यान भंग करने का आयोजन कर रहा है । अब दर्शक के चित्त मे इस प्रकार की घटना का आवेदन जैसे सहज है उसी प्रकार व्यापक भी है । दूसरा कारण, चिरकुमार सभा के प्रवीण सभापति चन्द्रमाधव वाबू उक्त सभा के भूतपूर्व सदस्य अक्षय और उसके इ्वसुरालय के दूर सम्पर्क्षीय सम्बन्धी रसिक प्रभूति सजीव पात्र है । तीसरा




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