अमर - भारती | Amar - Bharati

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अमर चन्द्र जी महाराज - Amar Chandra Ji Maharaj

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विजयमुनि - Vijaymuni

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ अमर भारती-संदुर्शन ६ पडला है । इसमे संदेह नही है कि कथिवर श्रो की स्तेहस्तिग्ध ` चाणी की स्वाभाविकता ने पारस्परिक वेयक्तिक सहानुभूति को चहुत बल दिया है। यद्यपि विशिष्ट प्रसंगभूत समस्याओं सुम विवेचन भी इसमे सन्निविष्ट दैः जिना नेमित्तिक सम्बन्ध भले ही केवल जयपुर लक सीमित हो, किन्तु, इनका स्वर सम्पूर्ण मानव समाज की समस्याओं को सुलकाने में सहायता देता है । सांसारिक जीवन से विसुख रहने बाला साधक लोको- त्तर जीबन की शरोर तन्मयतापूवेक बढ़ते हुए, किस प्रकार जनमन उन्नयनाथं प्रयत्नशील है, इसका ज्वलन्त प्रतीक प्रत्येक व्याख्यान मे प्रतिविम्बिल है । बास्सल्यरस की अजख धाया द्वारा म्रवादित ये विचार्कण मानव समाजे की स्थाया सम्पत्ति है । विना किसी मेदभाव्र के किसी भी सम्प्रदाय के महान्‌ पुरुषों के 'लि विवेचक श्रीकी भावना, अत्यन्त संकीएंलामूलक वातावरण में लने ढलने वाज्ञे जेन मुनिर्यों के लिए, एक ऐसा अनुकरणीय, आदश उपस्थित करती है जिसकी इस समन्वयवादी नवयुग जागरण में सबसे अधिक आवश्यकता है । असाम्प्रदायिक मनोवृत्ति को जीवनमें साकार करना सच- सुच प्रस्येक व्यक्ति के लिए सभव नदीं । साम्मरदायिकता को बिपतुल्य मानने वाले बहुत ऐसे भां उपदेशदाता हैं,जिनका,अर्थात्‌ असास्प्रदायिक व्यक्तित्व भी एक सम्प्रदाय के रूप में ही अस्तित्व रखता ह ! इसका कारण उनकी वयक्तिक विचार शली न होकर वलसान की ओर विवेक हीन उपेक्षा ही कहतां होगा |




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