देश-सेवकों के संस्मरण | Desh-Sevakon Ke Samsmran

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Desh-Sevakon Ke Samsmran by विष्णु प्रभाकर - Vishnu Prabhakar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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डा० मुख्तार अहमद अंसारी ९५ नहीं लिखा उसमे मुझे खास तौर पर अपने ऊपर पाबंदी लगावी पड़ी। ऐसा करके मेने करीब-करीब अपने साथ जुल्म किया। सगर डा० अंसारी के स्वगवास पर मुझे कोई ऐसा आत्म-निग्नह करने की जरूरत तही । कारण यह ह कि वें निस्सदेह हकीम अजमल खां की तरह ही हिदू-मुस्किम एेक्य के एक प्रतिरूप थे । कडी- -कडी परीक्षा के समय भी वह्‌ अपने विश्वास से कभी डिगे नही । एक पक्के मुसलमान थे । हजरत मृहुम्मदसाहब की जिन लोगों ने जरूरत के वक्त मदद कौ थी, वे उनके वशज थे और उन्हें इस वात का गवं था । इस्लाम के प्रति उनमे जो दृढता थी ओौर उसका उन्हे जो प्रगाढ ज्ञान था उस दढता ओर उस ज्ञान ने ही उन्हे हदु मस्लिम-ऐक्य मे विश्वास करनेवाला बना दिया था । अगर यह कहा जाय कि जितने उनके मुसलमान मित्र थे उतने ही हि मित्र थे तो इसमें कोई अत्यक्ति न होगी। सारे हिंदुस्तान के काबिल- से-काबिल डाक्टरों में उनका नाम लिया जाता था। किसी भी कौम का गरीव आदमी उनसे सलाह लेने जाय, उसके लिए बेरोक- टोक उनका दरवाजा खुला रहता था। उन्होने राजा-महाराजाओ और अमीर घरानो से जो कमाया वह अपने जरूरतमद दोस्तों मे दोनो हाथों से खच किया । कोई उनसे कुछ माग्नने गया तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि वह उनकी जेब खाली किये बगेर लौटा हो और उन्होने जो दिया उसका कभी हिसाव नही रखा। सैकड़ों पुरुषों और स्त्रियों के लिए वह एक भारी सहारा थे। मझे इसमें तनिक भी सदेह नही कि सचमुच वह्‌ अनेक लोगों को रोते-विलखते छोड गये ह । उनकी पत्ती वेगमसाहिवा तो ज्ञानपरायणा शानपरायणा हूं, यद्यपि वह॒ हमेना वीमार-सी रहती हे । वह इतनी वहादुर हं ओर इस्लाम पर उनकी इतनी ऊची श्रद्धा ह कि उन्होने अपने प्रिय पति की मृत्यु पर एक आंस भी नही भिराया । पर जिन अनेक व्यक्तियों को मे याद करता हु वे ज्ञानी या फिलासफर नही है । ईश्वर में तो उनका विश्वास हवाई हूं, पर डा० अंसारी में उनका विद्वास जीवित विश्वास था | इसमे उनका कोई कसूर नही । डाक्टर-




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