विध्यतिरिक्त चतुर्विध वेदवाक्यों का मीमांसाशास्त्र - सम्मत - स्वरूप | Vidhyatrikt Chaturvidha Vedwakyon Ka Mimansa Shastra Sammat Swarup

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Vidhyatrikt Chaturvidha Vedwakyon Ka Mimansa Shastra Sammat Swarup by श्रीमती गायत्री देवी - Srimati Gayatri Devi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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“मीमाता का ब्युत्पत्पात्प्छ अथ - मीमाशभा* शब्द कौ तत्त मादडन्माने अथवा^मात पूजायाम्‌ धातु ते स्थार्थ में तन प्रत्यय ए+ मान्य्ध्दादशान्भ्यो दीघअचाभ्यात्तस्य 1 हत पाणिनि पत्र से अ्यासके अकार कौ दीर्घं करके दर्द ই | भवाददिगणीय “मान” धासु का अर्थ पूजा एवं चुरादिंगणीय “मात” धातु का अय कविर ३ । अतः मोमाना श्रब्द का अर्थं ह « परम-पुरुणार्थ त्वर्ग का कारणभूत प्रशत्त वार या आदरणीय ्विक्वना | पूत्रकार जमििनि ने मोमाश्वाशास्ते के प्रततिजा पुत्रे अथातो धर्मन्जिजाला में जिन्नाता पद का प्रयोग मामाता के लिये किया ६. ॥ শ্নীমীানা” पद का प्रयौग आ रमणड्रान्यो मे अनेकशः मिलता ह । कौणोतकि ्राहमण भं “म्रोभाता शब्द का प्रयोग विवार विमं करने के अथं मे प्राप्त रोता मे | उपनिषद वादन्म्यमभी मौमात्ा का तात्पर्य उच्च दार्शनिक विषयोः पर ন্লিলা কস মী ই | वस्तुतः मौीमाता का प्रेज्य प्रतिपाद्य विष्य कर्मकाण्ड का ध्वस्प- च्णन दी ३ । अतः मीमातादर्शन का प्राम्भ स्वरूप कर्मकाण्ड के अनुऽ्ठानोः ते नम्बरिन्धत विवषया को प्रामाणिक रूप में स्थापित करना था | मीमासा* को कं स्थन पर तन्त्र, न्याय एव॑ तर्क संज्ञा ते अभिहत क्या गया উ | শ্নিিশ্বিনঃ লন वेदः | पा० गृण पू [ विथ अथात्‌ जादमण, धिय अयात्‌ मक्र, तकं यानी मोमासादर्शन | दाशीनक-शिरो मणिं वाचध्पिति मित्र ने भी तात्यय टीका मेँ “वेदीदभवस्तको নীলালা ইনা कथन 1- पा० पू 3८18 2« पटदा-मिराम शा ज्ली-त्तम्पादित अध्वरमीमाता' कु०वृ०भाग>बको ‰०प्‌०-4 उ “इत्ति मोमात्रीन्त ब्द्मयादिनः ६ तै0स95/7/1 ६, “उत्थृज्या' नो त्वृज्यामिाति नो मालन्ते । काठक ০৩৮৫7 ঘন में7ल॑0128/5 दल्थाविं |




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