जैन दर्शन के मौलिक तत्त्व | Jain Darshan Ke Maulik Tatva

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Jain Darshan Ke Maulik Tatva by मुनि नथमल - Muni Nathmal
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
10 MB
कुल पृष्ठ :
560
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सामूहिक परिवर्तनविश्व के कई भागों में काल की अपेक्षा से'ज़ो বাহার उसे कऋरम-हासवाद! या क्रिम-विकासवाद! कहा जाता है। “कल से कमी उन्तति और कभी अवनति हुआ करती है। उस काल के मुख्यतया दो भाग होते हैं--अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी |अरवसरपिणी मे वणे, गन्ध, रस, स्पशं, सहनन, संस्थान, श्रायुष्य, शरीर, सुख आदि पदाथथों की क्रमशः अवनति होती दै ।उत्सर्पिणी में उक्त पदार्थों की क्रमशः उन्नति होती है| पर वह अवनति और उन्नति समूहापेज्ञा से है, व्यक्ति की अपेज्ञा से नहीं।अवसर्पिणी की चरम सीमा ही उत्तर्पिणी का प्रारम्भ है और उत्सपिंणी का अन्त अवसर्पिणी का जन्म है। क्रमशः यह काल-चक्र चलता रहता है।प्रत्येक अवसपिंणी और उत्सर्पिणी के छह-छह माय होते हैं :---(१ ) एकान्त-सुषमा(२) इषमा(३ ) सुषम-हुःपमा(४ ) दुःषम-सुषमा(५) इषमा(६ ) दुःपम-हुःपमाये छह अवसर्पिणी के विभाग हैं। उत्सर्पिणी के छृह विभाग इस व्यति- क्रम से होते हैं :--( १) छुःपम-दहुःघमा(२) दुषपमा(३) दु.पम-चुपमा(४ ) सुपम-दुः्पमा(४ ) छुपमा(६ ) एकान्त-सुपमा




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