मानव - धर्म - सार | Maanav Dharm Saar

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
13 MB
कुल पष्ठ :
229
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)प्रकार लाभ कम, हानि अधिक पहुँचाता है।
कभी २ यह रुपया दीवाले में आजाता है । उससे
विशेष कर बेचारी स्त्रियां को बडा कष्ट होता है।सदेव बडी २ आफतों का डर उनको रहता है ...दानधमं-महासभा सारे भारत के सनातनियों की बनइसकर उसका बेंक बन कर धर्मादे का रुपया १०) रु०
सेकडा सब निकाल कर उसमें जमा करें। उसमें
से ) सभा सुन्दर २ कामों में ख़चे करे जिनसे
प्रत्यक मनुष्य परम लाभ और खर्गीय आनन्द पाने
ओर लुटाने वाला बन जाये। शेष ३ को दाता
चेक द्वारा समय समय पर लेकर ख़चे करेंसभा के कारण झआय्य-समाजियां की ओर
आकर्षण कम होगा । आय्य॑समाजी इससे प्रसन्न
हाकर सहायता करेंगेसेम्बरी का पत्र ৫ ও
बड़ा दान सब के करने याग्य “पिताजी सबप्रापकः भक्त बन जाये?
व्यवहारादिखेती, गापालन और व्यापार वैश्यों के धर्म हैं। इन काकरना धर्म है न करना अधमे है। यह कहना
गलत है कि दुनिया क काम करना ग्रधमं है । खेती
से अन्न पैदा होकर ओर दुकानों आदि से भी सब
का उपकार होता है । विक्रोरिया महारानी के
स्व्गत्रास पर बाजार बंद ष गये तो दुकानोंएत৬০০২-৩---?০?१०१-१०२
१०२-१ ०४
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