चरित्रपाहुड प्रवचन | Charitrapahud Pravachan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शाथा ६-7 1 हु सम्यवरत्व है औरः उससे वृत्ति क्या बन रहो है ? “उसकी छोर देयो, नो! वह ,ग्राचरण 'है, क्योकि प्रति शर्का शादि दोपोका त्याग ने बने तो, अपने 'आ्रात्माका आचजण नही-हो>सकृता -। जिनेन्द्र देवने ज्ो।वस्तुका स्वरूण कहा।उसमें जोनजो अचुभव !गम्य[त्ीजें है वेइस,,ज्ञानीके श्रनु- 'भवमे उत्तरी हैं'यौर उससे जिनेन्द्रवचनमे उसको हढ श्रद्धा हुई है: और ,ऐसी-हढ: श्र द्धा--हुई, है कि जो कुछ परोक्षभरूर्त- बातोका वर्णन है; रवर्ग, त्रक;/विमानोकी सख्या; व्विप्लानोको उ्ेत फल दनियाक्नी जगहोका वर्णंन'जो-जो भी वर्शन प्राया है उसपर শ্বালীলী।ছুযা,গুভা- हुई- है,क्योकि अनुभव गम्य तृत्वमे ऐसी हृढ श्रद्धा हुई कि-इसके -बत्ताने,, वानर जिनेन्द्र देवःधृगं-सत्य है, पूणं प्रामाणिक हैं, उनमे किसी तरहकी शका:ही-तही है'। अ्रतएवं जिनागममे ,जो कुछ कहा गया 'है वह सब निर्दोषः क्रथनं है, उषमे सशय नही है, एेमी णकाक -निचृत्ति है । {+ = + ४(१४ ) ,सम्यक्त्वाचरणसे निःकाक्षता--सम्यवत्वान्न रणमे भोगः, भोगनेकी श्रश्निल्लाषा सम्यश्दृष्टिके सही रहेती । यद्यपि “चारित्रमो हुक : उदयसे ज्ञानी भी-किसी,पदवीमे ,सोगोमे, लुगता है, पर उसका भीतरीण्भाव आ्ान्त्रिक श्राशयःतही लगता-॥ ,यहू भीहएक आश्चयैंको बात है कि मोग .मोगंना भी पड रहा प्रौर भोतरमे परद्धतावा भी कर।रहा।, इन।दो धाराग्रोका समम इस ज्ात्तीके-चल रहा टै । त्रिरक्ति भीं चल.रही हि आर अवृत्ति भी লব 1 जैसे किसी को! मदिरी पीनेकी जरा/भी आदत नही है, न। कभी » पी, है, दूर रहता है शोर. दूर रहना ही चाहिए, ेसा- उसकरा-सकाल्प' है.फिर भी-किसी, रगे मस्त होनेपर, „कुटुम्बी, जनो द्वारा किसी देवामे मविराकाः सयोग करके, पिलाया जाय; तो [उसे, बेहोशी नही भ्राती +.एक गी वहु दवाकर साथै, दुसरे मदिरासे वह्‌ विरक्त है तो-इसका भी, श्रन्तर पड़ता है, कि নিহলল ভীনজ্তঅল্কা मद- न-+चढ़ ।1कभी,थोडा, अन्तर यह देखा जाता कि. कोई. बेहोश करने वाली तीज पी ली किसी 'परिस्थितिमे जबरदस्ती. झोर अपने' ज्ञानक़ी , ओर दृष्टि बनाय हहे कि मैं तो स्वच्छ॑ज्ञांनमूति 'हुऔर उससे-मेरा;कुछ/लगाव नही, वह पीनेमे श्रायो,है तो कुछ समय बाद दूर हों जायगां, ऐम्ा ,भ्रीतरमे, भाव॑ ,रेखे तो, उसका नशा ,सामान्‍्य रहेगा झौर पोकर उसहोीस्मे ग्रासक्त हो, ब्ह-ऐसा बारजार सोचे कि, मैंने: पिया है, तो;उसके नशा शीघ्र ही श्रायगा, , विरवितसे,भी. ; कुछ प्रन्तर,,पड़ जाता,है,- बाहरी, बात़ोमे भी ।5,फिर,तो जहाँ “अपने श्ात्मामे ही'विषयविर्‌वितु-पडी हुई है वहाँ ,कदाचित्‌न्क्रमंकी-अल़वत्तासे भोग भी भोगने {पडे तो वर्ह^उनसेविरक्त रहता है । सम्यस्टृष्ठि। ज्ञात्ती जीवकी , वह श्रद्धा, कलाका इतना श्रद्‌ भुत माहात्म्य है कि| उसको, निरेन्तराझपने सहज अविकार- स्वसप्रमे प्रतोति-- रहती है और “यही बडो, कमायी है, जो भ्पने पश्रापसे5ऐसी, प्रत्तीति,,बना-ले, - सदा, यह ही धानि रहै किरम तो,श्रविकार-चेतनागमात्र ज्ञात्रा हूं श्रौर जो करं सुकपरन्मलिलता छारर्ही है, यह सग




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