इष्टोपदेश प्रवचन | Ishtopadesh Pravachan

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Book Image : इष्टोपदेश प्रवचन - Ishtopadesh Pravachan

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about खेमचन्द जैन - Khemchand Jain

Add Infomation AboutKhemchand Jain

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
इश्लोपदेश प्रवचन प्रथम भाग ११ संकट मेटनेका उपाय बाह्य वएतुका उपयोग नही है । अपना मुख्य काम है अपनेकों ज्ञान गनौर आनन्दरवरूप मानता । यह शरीर भी मै नहीं हु--ये विचार विकल्प जो कुछ मनमे भरे हुए है ये भी मै नही हु । मै तो केवल ज्ञानानन्दस्वरूप हु। इस प्रकार श्रपने आपकी प्रतीति हो तो शान्तिका मार्ग मिलेगा। बाह्य पदार्थोका उपयोग होनेसे आनन्द नही मिल सकता है। | आनन्द विकासके पथमें व्यवहार और निश्चय पद्षति -- उस यथार्थ आनन्दको प्रकट करनेके लिए दो पद्धतियोक्रो लिया जाना चाहिये--एक व्यवहार पद्धति और एक निशचय पद्धति | जैसे हिसा, भूठ, चोरी, कुशील, परिग्रहका त्याग कर देते है, और और भी मन, चचन, कायकी शुभ प्रवृत्तियाँ कर रहे है ये सब व्यवहार पद्धतिकी बाते है। निरेचय पद्धति में अपने आपके सहजर्वरूपका ही अवलोकन है, इन दो बातोमेसे उत्कृष्ट बात अपने श्रात्मा के स्वभावके परखकी है, इनमे जो अपना परिणाम लगाते है उन्हें जब मोक्ष मिल जाता है इन परिणामोसे तो इससे स्वर्ग मिल जाय तो यह शआ्राइचेगकी बातत नही है । जो मनुष्य किसी भारको श्रपनी इच्छासे, बहुत ही सुगमता और शीघ्रतासे दो कोश तक ले जाता है वह उस भारको पाव कोश ले जानेमे क्‍या खेद मानता है ? वह तो उस पाव कोशको गिनती मे ही नही लेता है, शीघ्र उस भारको ले जाता है। यो ही जिस भावसे मोक्ष प्राप्त करा देनेकी सामथ्य है वह कौनसा भाव है जिस भावपर हृष्टि देनेसे ग्वग भी मिल जाता है সী मोक्ष भी मिलता है ? अपने-अपने पद और योग्यताके अनुरूप वह भाव है अपने आपकी सच्ची परख । जो पुस्ष' श्रपनी परख नही कर पाते वे कितनी ही लोकचतुराई कर ले पर शाति नही मिल सकती । इस तरह सबसे पहिले अपनी सच्ची श्रद्धा करना जरूरी है। में पुरुष हू, मैं स्त्री हु, मै श्रमुककी चाची हु, अम्रुककी सा हू, अ्रमुकका चाचा हू इत्यादि किसी भी प्रकारकी अपनेमे जो श्रद्धा बच्चा रक्‍ली है उसका फल क्लेश ही है। कहाँ तो अपने भगवान तक पहुंचना था और कहाँ इस शरीरपर ही दृष्टि रख रहे है । इृष्टिकी प्रख--एक 'राजसभासे बड़े-बडे विद्वान श्राये थे । वहाँ एक ऋषि पहुंचा जिसके हाथ पैर, पीठ, कमर सभी टेढे थे भौर कुरूप भी था । वह व्याख्यान देने खडा हुआ तो वहाँ बेठे हुए जो पडित लोग थे वे कुछ हँसने लगे क्योकि सारा अंग टेढा था। অন্ত विद्वान ऋषि उन पडितोको सम्बोधन करके बोला-हे चमारो ! सब लोग युनकर दंग रह गये कि यह तो हम सभी लोगोको चमार कहते है । खेर, वह स्वयं ही विवरण करते लगा । चमार उसे कहते है जी चमडेकी अच्छी परख कर लेता है, तो यहाँ आप जितने लोग मौजूद है सब लोग हमारे चमडेगी परख कर रहे है। आप लोग हमारे शरीरका चमड़ा निरख कर हंस रहे है, तो जो चमडेवी वरख करना जाने कि कौनसा श्रच्छा चमडा




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now