लोक परलोक का सुधार | Lok Parlok Ka Sudhar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द लोक-परलोकका सुधार भाग ३ केनोपनिषदूमें अनेक मन्त्रोद्दारा यह बात बतायी गयी है कि ईश्वर ही हमारी सम्पूर्ण इन्द्रियोमें शक्ति और प्रकाश दे रहा है । श्रोत्रस्य श्रोन्नं मनसो मनो यद्‌ वाचो हि वाक्‌ स उ प्राणस्य प्राणः। वही कानोंकी श्रवणराक्ति, मनकी मननराक्ति, वाणीकी वाक्राक्ति और प्राणकी जीवनशक्ति है यन्मनसा न मनजुते येनाहुमेनो मतम्‌ | तदेव ब्रह्य त्व विद्धि । “जिसका मनके द्वारा मनन नहीं हो सकता, जिसकी शक्ति पाकर ही मन मननशक्तिसे सम्पन्न हुआ है वही ब्रह्म समझो |? यहाँतक ईश्वरकी सत्ता, महत्ता, स्वरूप तथा सम्बन्धके विषयमें कुछ थोडे-से शाल्लीय प्रमाणोंका दिग्दर्शन कराया गया | तवी और युक्तिके द्वारा विचार करनेसे भी इश्वरकी सत्ता प्रत्यक्षवत्‌ सिद्ध हो जाती है | हम यह प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं कि हमारा ज्ञान, हमारी शक्ति और हमारी विद्या सब थोडी है, किंतु हम सदा उसे बढ़ानेकी चेष्टामे लगे रहते हैं । प्रव्येक स्वल्पता महत्ताकी ओर अग्रसर होती है | स्वल्पता ही महत्ताकी सत्ता सिद्ध करती है । जीवरमें अल्पशक्ति है, तो कहीं पूर्ण या सवशक्ति भी होगी ही । जहाँ होगी, वही सर्वशक्तिमान्‌ रर है । इसी प्रकार पूर्णं ज्ञान, पूर्ण आनन्द तथा पूर्ण विद्याके भण्डार श्ट्वरका होना निधित है । नदीकी सीमित जल्घारा अक्षय और अनन्त जलके भण्डार समुद्रकी ओर अग्रसर होती है । इसी प्रकार सीमित जान, गक्ति ओर विघावाला जीव असीम ज्ञानानन्धके मागर परमात्मार्मे मिलकर पूर्णतम होनेके लिये सदा यत्नशील रहता है | यह प्रय दी उसकी साधना है |




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