जैन कहानियाँ भाग - १३ | Jain Khaniya Part - 13

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Jain Khaniya Part - 13 by महेंद्र कुमार जैन - Mahendra kumar Jainसोहनलाल बाफणा - Sohanlal Bafana

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२ जन कहानियाँ माँगा। माँ समझ नहीं पाई कि आज दिन रहते ही खाना मॉगने का क्‍या प्रयोजन है ? प्रतिदिन राधि में ही भोजन बनता था ओर घर के सभी सदस्य उसी समय खाते थे। माँ ने उनसे पूछा, तो अपनी प्रतिज्ञा के बारे में उन्होंने बता दिया । माँ की यह बहुत बुरा लगा । उसने दोनो को ही एक गहरी डाट दिखाई और फिर कभो ऐसा न करने के लिए कहा। उस दिन उनको भ्लोजन नहीं मिला | प्रहर रात बीतने पर भोजन बना । यशोघर भोजन करने के लिए बैठा | उसने अपने दोनों पुत्रों को बुलाया और भोजन करने के लिए कहा। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण दिलाया । यशोधर बहुत बिगडा । उसने कहा--'कल के बच्चे और धम की यह ठेकेदारी ? मैं कभी नहीं चलने दूंगा 1 दोनों की ही वहुत डराया-धमकाया गया, पर, वे अपनी प्रतिज्ञा पर हृढ रहे । योई भी किसी को अपने से सह- मत न कर सका | यक्षोघर ने राभि-भोजन को कुलधर्म कह कर भी उन्हें सहमत करने का प्रयत्न किया, पर, उसे सफलता नही मिलो 1 भस्लाकर उसने पत्नौ से प्रच्छन्न सपमे कह दिया---“'दिन में भोजन वो दूर रहा, चने खाने को भी न दिये जायें। जव भूखे रहेंगे, अवल ठिकाने भा




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