कवि सम्राट कालिदास | Kavi Samrat Kalidas

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Book Image : कवि सम्राट कालिदास  - Kavi Samrat Kalidas
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मालविकाग्निमित्र श्राजा ने योगिनी से पूछा--इन दोनों का निणय कैसे किया जाययोगिनी--कोई किसी कला में स्वयं निपुण होता है, और कोई दूसरे को उसकी शिक्षा देने में - विशेष चतुर होता है । वास्तव में श्रे छ गुरु वही है जिसमें ये दोनों गुण विद्यमान हों ।गौतम को तो इस विचार का समथन करना ही था, इसलिए वह तुरंत वोला--सुना; उपदेश देखकर लिणय होगा ।हरदत्त ्औौर गणदास यह मान गये। धारिणी ने कहा-- यदि मुख शिप्या नास्योपदेश विगाड़ दे तो इसमें गुरु का क्या दोप ?राजा--महारानी.! यह गुरु का ही दोप समभा जाता है योग्य को शिक्षा देना ही गुरु की मूखंता हैं ।महारानी प्रारंभ से ही सब समभ गई थीं। वे गणदास की शोर मुँह करके वोलीं--तुम्हारी शिष्या तो अभी थोड़े ही समय से शिक्षा पा रही है । उसे बुलाना नाट्योपदेश का झपमान करना है। परंतु गणदास न माना । उसने कहा--इसी लिए तो मेरा हठ है।झब महारानी ने सोचा कि मेरी चाल नहीं चल सकती | उन्हें योगिनी पर क्रोध ाता था । वे योगिनी के विपय में मन दी मन कहने लगीं कि यह मुझे जागती हुई को भी सोई हुई-सी समभती है। गणदास अब बहुत दृठ करने लगा। विवश होकर मद्दारानी को स्वीकृति देनी ही पढ़ी । दोनों के उपदेश देखे जाने का निश्चय हुआ । उससे दोनों की छोटाई-वड़ाई विदित दो जायगी ।दोनों नाट्याचाय संगीतशाला में श्रबंध करने चले गये।जाते समय उन्हें योगिनी ने ादेश दिया कि पात्रों को विरले




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