कम्ब रामायण | Kamb Ramayan

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Kamb Ramayan by कंबन - Kamban
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
28.06 MB
कुल पृष्ठ :
562
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मंगछाचरण कान्‍्य-पीठिका हम उस भगवान्‌ की ही शरण मे हैं जो समस्त लोकों का सर्जन उनकी रक्षा ओर उनका विनाश--ये तीनों क्रीडाएँ निरतर करता रहता है । बडे-वडे आत्मजानी भी उस परमसात्मा के पूर्ण स्वरूप को नहीं जान सकते उस परमात्मा ( के तत्त्व ) को समसाना मेरे जेसे ( मदवुद्धि ) व्यक्ति के लिए असभव हे फिर भी शास्त्रों मे प्रतिपादित त्रियणों ( सत्त्त रज और तम ) मे--जिनका प्रतिसुप बनकर वह परमात्मा न्रिमूत्ति के रूप में प्रकट हुआ उनमें से प्रथम गुण के स्वस्प ( विष्णु ) भगवान्‌ के कल्याणकारक युणो के सागर से गोते लगाना तो उत्तम ही है | जिन जानियो ने आरभ तथा समासि मे हरि 3४ कहकर नित्य और अनन्त वेदो को अधिगत ( प्राप्त ) कर लिया है ओर जो अपने परिपक्व जान के कारण ससार- त्यागी बन चुके हैं वे महानुभाव उस ( विष्णु ) भगवान्‌ के उन चरणों को जो सन्मार्ग पर नचलनेवाले भक्तों के उद्धारक हैं छोडकर अन्य किसी से प्रेम नहीं करते | अकलक विजयश्री से विभ्ूपित ( श्रीरामचन्द्र ) के गुणों का वर्णन करने की अमिलापषा मैं कर रहा हूँ यह ऐसा ही हे जेसा कि कोई विलली घोर गर्जन करनेवाले ऊँची तरगों से भरे क्षीरसागर के निकट पहुंचकर उसके समस्त क्लीर को पी जाने की अमिलाषा करे | अभिशाप की वाणी से ( उस दिन ) सतत तालत्रक्ो को एक साथ भेदन कर देनेवाले ( श्रीराम ) की महान्‌ गाथा आविभत हो गई थी उस गाथा को सुर काव्य के रूप में कहनेवाले ( वाल्मीकि ) की वाणी जिस देश मे सुस्थिर हो चुकी है. वहीं मैं भी अपने ( अर्थगामीर्य-हीन ) सरल तथा डुबंल शब्दों मे दसरा काव्य रचना चाहता हूँ यह भी केसा ( वुद्धिहीन ) प्रयास है । क्रौच को मारनेवाने व्याध के प्रति वाल्मी कि के मुँद से जो असिशाप-वचन निकल पद था वही रामायण का प्रथम मगलाचरण मी छुआ




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