नारदसंहिता | Narad Sanhita

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Narad Sanhita  by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भाषारीकास ०-भ ० २. (पशु) होती हैं और चेत्रशुक्का मतिपदाकों जो वार होता हे वह वर्षेका राजा कहढाता है ॥ 3 ॥ मेषसंक्रांतिवारिशो भगेत्सोधपि च भूपातिः ॥ ककंटस्य तु वारेशी सस्येशस्तत्फलं ततः ॥ २ ॥ और मेषकी संक्रांतिको जो वार होवे वह सेनापति होताहे ककें की मंक्रांतिको जो वार हो वह सस्पपति होताहे ॥। २ ॥ तुलारसंक्रांतिवारेशो रसानामधिपः स्मृतः ॥ मकराधिपतिः साक्षा्नीरसस्प पतिः कमात्‌ ॥ डे ॥ तुठाकी संकांतिका वार रमेश होताहे और मकरकी संक्रांति का जो वार होवे वह नीरसेश अत सुव्ण आदि धातु- ओंका तथा चखादिकोंका पति होता है ॥ ३ ॥ अष्देखरश्वमूपो वा सस्येशो वा दिवाकरः ॥ तस्मिन्नब्रे ृपक्रोघः स्वल्पसस्यायेवृष्टिकृत ॥ ४ ॥ वषपति ( राजा ) वा सेनापति ( मंत्री ) अथवा सस्येश स॒ये हो तो उस वषेमें राजआंकों को रहे थोड़ी खेती हो अन्नका भाव महंगा रहे वर्षा थोड़ी होवे ॥ ४ ॥ अष्देवरश्वमपो वा सस्येशो वा निशाकरः ॥ तस्मिनब्दे करोति कमां परणी शालिफलेशुमिः ॥ ५ ॥ वषपति वा सेनापति तथा सस्पपति चंद्रमा होय तो उस्वर् में गेहूं चौवल आदि धान्य तथा इंख आदि से भरपूर परथ्वी होवे ॥ १ ॥।




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