शुभ संयोग | Shubh Sanyog

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Shubh Sanyog by विमल मित्र - Vimal Mitra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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७ उयाग | २३8 नन्दन स्ट्रीद में कमन्ा का मकान था। धहो पूजा क्रे कमरे में उस समय कीर्तन हो रहा घा-- साधव, कत तोर करव बड़ाई 1 उपभा दोदर फ्ह्वृव ककरा हम कहितहूँ अधिक सजाई ॥ जयीं सिरि्घंड सौरभ अति दुरलभ तबों पुनि काठ कठोरे। जमों जगदीस निस्ाकर तओं पुनि एकहि पच्छ उजोरे ॥ फीर्तनिया कीर्तन कर रहे थे । उनके साथ दो सोग ढोल-मजीरा थजा रहे पे । उनके पीछे कमला राधाक्ृष्ण को मूति की तरफ मूह किये हाथ थोड़े बैठी थी । आँखें बंद थी । कीर्तन के ताज पर वह धोरे-धौरे सिर हिलातो जा रहो थी | तभी अचानक गिरि दोड़ता हुआ आया और बोला--माठा षी, माता पी । इस पुकार पर भावों कमला का ध्यावे ट्वटा। उन्होंते पीछे मुह कर पुछा- वया है गिदि ? गिरि वोला--माता जी, मालिक आये हैं । “मालिक ! कमला को बड़ा आश्चर्य हुआ | पह सहसा समझ ने धक्की कि अब या करे 1 लेकिन जयसुन्दर बावू लव तक झूता खटखटाते हुए वहाँ पहुँच गये । जययुन्दर थावू को देख कर कमला सड़ी हो गयी । उसने जययुन्दर यावू की तरफ देखते हुए पुछा--आप ? बचातक ?ै ++बयों, नही आना चाहिए ? फमसला ने उस वात का उत्तर न दे कर कहां--चलिए, हम दूसरे कमरे में जाये । जयमुन्दर बाबू कमला का अनुसरण करते हुए चले ओर बोने--नाहक पवढा गयी । वया मैं जूता पहत कर तुम्हारे पूजा के कमरे में चला जाता ? कमला ने इसपय कोई उत्तर नही दिया । क्र




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