रस अलंकार और पिंगल | Ras Alankar Aur Pingal
श्रेणी : भाषा / Language

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4.16 MB
कुल पष्ठ :
130
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)(११ )
स्वाभाविक क्रिया-से दोते हैं। जैसे” फुफकारते हुए काले साँप को
ऋपने सामने आता देखते दी दर्शक की घिग्घी वेंध जाती है; बहुतेरा
यत्न करने पर भी उसके मुँह से वात नहीं निकलती; वह वहाँ से
सागना भूल-सा जाता दे. । ये व्यापार ्राप-से-झाप शरीर के द्वारा
: हो जाते हैं । ये कार्य सीधे चित्त की जन्मजात मनोवृत्ति, अर्थात्, सत्व
से उत्पन्न होते हैं । इसी से उनको सात्विक झलुभाव कहते हैं।
कायिक अलुभाव यत्नज होते है किन्तु सात्विक झयरनज । सात्विक
ब्यूनुभाव 'ाठ होते हैं:--
(१) स्तम्भ (प्रसन्नता, लज्जा; व्यथा आदि से शरीर की गति का
वअप्राप-से-झाप रुक जाना);
(९) खेद (श्रम' अजुराग; 'आाश्चर्य आदि, से शरीर का स्वतः
पसीने से भर जाना);
(३ रोमाय्व (हपे, भय आदि से रोंगटों का खड़ा हो जाना),
(४) स्वर-भन्न (स्वाभाविक रीति से जैसे शब्द निकलते हैं वैसे
न निकलना; चुप-सा हो जान);
(४) कम्प (शरीर का थर-थर कॉपने लगना),
(६) बैवण्ये या बिवर्णता (चेहरे का रह उड़ जाना; उसका
'फीका पड़ जाना);
(७) अभश्ु (श्कस्मात् 'मॉखों से 'मॉसुच्यों का बहने लगना); छोर
(5) प्रलय (सुध-चुध का खो जाना या चेतना-शून्यता 1)
यह स्मरण रखना चाहिए कि श्माश्रय की चेप्टाएं ही अनुभाव के
ब्यन्तर्गत हैं छालम्वन की नहीं ।
सश्चारी या व्यभिचरी भाव
रथायी भाव तो प्रधान मानसिक-क्रियाएँ हैं । इनके साथ ही कुछ
देसी स्थायी मानसिक कियाएँ भी होती हैं जिनका 'ाविभाव कुछ
काल कँ लिए ही द्ोता दे । वे स्थायी भावों के समान निरन्तर नहीं
रहती स्थायी भावों को पुष्ट करके दी विलीन-सी दो जाती हैं । ऐसे
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