उपासकदशांग सूत्र | Upasakandasanga Sutra

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Book Image : उपासकदशांग सूत्र - Upasakandasanga Sutra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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छ हि व्का अपना स्वातत्थ्य है। उसपर अपवाद बलात्‌ आरोपित नहीं किये जा सकते । ५ इससे कम, श्रप्तिक- सभी तरह की शक्ति वाले साधनोत्सुक व्यक्तियों को साधना में आने का अवसर मिल जाता हैं । फिर धीरे-धीरे साधक अपनी शक्ति को बढ़ाता हुआ ग्रागे बढ़ता जाता है। अपवादों को कम करता जाता है। वैसा करते करते वह श्रमणोपासक को भूमिका में श्रमणभूत--अ्रमणसह्श तक बन न सकता है | यह गहरा मनोवैज्ञानिक तथ्य है । आगे बढ़ना, प्रगति करना जेसा अ्रप्रतिवद्ध और निद्द नव मानस से सधता है, वैसा प्रतिबद्ध और निगुहीत मातस से नहीं सध सकता । यह अतिशयोक्ति नहीं है कि गृही की साधना में जैन धर्म की यह पद्धति निःसन्देह वेजीड़ है । अतिचार-वर्जन श्रादि द्वारा उसकी मनोवैज्ञानिकता और गहरी होजाती है, जिससे ब्रती जीवन का एक सार्वजनीन पवित्र रूप निखार पाता है। उपासकदशा : प्रेरक विषयवस्तु उपासकदशा अंगसूत्रों में एकमात्र ऐसा सूत्र है, जिसमें सम्पूर्णतया श्रमणोपासक या श्रावक- जीवन की चर्जा है। भगवान्‌ महावीर के समसामयिक आनन्द, कामदेव, चुलनीपिता, सुरादेव, चुललशतक, कुडकौलिक, सकडालपुत्र, महाशतक, नन्दिनीपिता तथा शालिहीपिता--इत दस श्रमणोपासकों के जीवत का इसमें चित्रण है । भगवान्‌ महावीर के ये प्रमुख श्रावक थे । समृद्ध जीवन : ऐहिक भी : पारलौकिक भी उपासकद॒शा के पहले अ्रष्ययन में आनन्द नामक श्रावक के उपासवासय जीवन का लेखा- जोखा है। विविध प्रसंगों में आये वर्णन से स्पष्ट है कि तब भारत की आर्थिक स्थिति वहुत अच्छी थी । आनन्द तथा प्रस्तुत सूत्र में वणित अच्य शावकों के वैभव के जो आँकड़े दिये हैं, वे सहसा कपोलकर्पित से लगते हैं पर वस्तुस्थिति वैसी नहीं है। वास्तव में विशालभूमि, वृहत्‌ पशुधन, अपेक्षाकृत कम जनसंख्या आदि के कारण कुछ एक' वैसे विशिष्ट धनी भी होते थे। धन की मूल्यवत्ता अवसर स्वर्णमुद्राओं में आंकी जाती थी । ं ह ऐसा कम है, उस समय के समृद्धिशाली जनों का सानस उत्तरोत्तर सम्पत्ति बढ़ाते रहने 'की लालसा में अपत्ती निश्चिन्तता खोना नहीं चाहता था। ऐसी वृद्धि में उत्तका विश्वास नहीं था, जो कभी सव कुछ ही विलुप्त करदे। इसलिए यहाँ बरणित दर्सो श्रमणोपासकों के सुरक्षित निधि (808०४६ 11१) के रूप में उत्तकी पू जी का तृतीयांझ पृथक्‌ रखा रहता था। घर के परिवार के उपयोग हेतु देनन्दिन सामान, साधन, साभग्नी आदि में भी अपनी सम्पत्ति का तृतीयांश वे लगाये रहते थे । वहां उपयोगिता, सुविधा तथा शानया प्रतिष्ठा का भाव भी था । दान, भोग और नाश धन की इन तीनों गतियों से वे अभिज्ञ थे, इसलिए समुचित भोग में भी उनकी रुचि थी] तत्तीयाझषे व्यापार में लगा रहता था । व्यापार में कदाचित्‌ हानि भी हो जाए, सारी प॒ जी चली जाएं सो भी उनका प्रद्स्त एवं प्रतिष्ठापन्न व्यवस्थाक्रम टूटता नहीं था । इसलिए उनके जीवन में एक 72028 और २55५-17 का भाव था। तभी यह सम्भव हो सका कि उन्होंने श्रमण भगवान हावीर के दर्शन और सा ब्ि८ भ जीवन भोग कं हे 3००13.“ कक डा दे आाप्त कर अश्रपना जीवन भोग से त्याग की ओर मोड़ दिया । ७... | ऑत्मत्र र तह व्य री रे है जैसे भोग ग्रु होकर व्यवित जब त्यागमय जीवन स्वीकार करता है तो उसे ग॒ में आनन्द आता था, त्याग में था, स्थाग सें आनन्द आने लगता है और विशेषता यह है कि यह आनन्द




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