छान्दोग्योपनिषद् | Chhandogyopnishad

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Chhandogyopnishad by रायबहादुर बाबू जालिमसिंह - Rai Bahadur Babu Zalim Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पूर्वाध । १७. पाप करके अशुद्ध करती भई । जब सतोगुणी दृत्तियोँ वाणी विषे स्थित चेतन प्राण की उपासना करती भई, तब्र उस वाणी बिपे स्थित चेतन प्राण को तमोगुण-बत्तियां फप से भ्रष्ट करती भई और इस अ्रक्रार पाप से संयुक्त हुए बाणी द्वारा पुरुष सत्य वे श्रप्तत्य दोनों बोलता है ॥ ३ ॥ सूलम्‌ | अथ ह चक्तुरुद्नीधमुपासाश्वक्विरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनों मर्म पश्यति दशनायं चादशनीय॑ च पाप्मना झेतद्िद्धमू॥ ४॥ पदच्डेद! । अथ, है, चच्चुः, उद्वीण्म्‌, उप!प्ताश्वक्रेरे, तत्‌ , ६, असुराः, पाप्मना, विविधु:, तस्मात्‌ , तेन, उभयम्‌ , पश्यति, दर्शनीयम्‌ , च, आदशनीयम्‌ , च, पाणना, हि, एतत्‌ , विद्धन्‌ ॥ कक के हु का $ के आतवय $ पु पदाथ छारत 1$ पदा थ च-भार अखुरा।-इृन्दरियों की तासस धू-फिर वृत्तियां * देवता अ्र्यात्‌ हृ- हभी कद्या न्द्र्या को साजछखक [+% पाप्मनानपाप करके की विविधुः-संसर्ग करती भई घहद्दा मे स्थित चेतन तहमःततू-इसी कारण छाः८< को श्र्थात्‌ चच्त ग्र- लेकर भिमानी देवता को +चन्ननेश्चय करके उद्धी धम्‌-४“काररूप से गजब हूभलीप्रकार तैनन्डस चत्त हारा डपासाश्षक्रिरे-उ पासना करती सई प्रभाव हि >> शर्त।यम्‌लदेखन के यधग्य च-भओर द्‌ कह उसी उस्ु के विपे पक +१ _] स्थित चैतन्य को |. अदशेनीयम्‌*ून देखने के योग्य तत्तू-( था चततुभ्राभि- वस्तु का सानाी दुवता को पश्याते-रेखता है




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