क्रियोडींश | Kriyodinsh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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तक मापादीकासमैत) |... (४५३) फूषोणि । हुम्बादिवा तथा देवि शान्तते दृत्युक्येडपि थृ ॥ आकषणे तु मघुना भस्मना कूरकर्माे । अब शिवस्रान कहाजाता है । वहयकमेमें घृत और मधुसे स्नान करावे, ,शांति तथा सृत्युज़्यजप कमेमें दुग्धादिकसे स्नान करावे, आकपेण करममें मधुसे स्तान करावे, कर कमेमें भस्मसे स्नान कराये । अस्य परिधाणम्‌-शततोलकमानेन हव्यमेसत्य- कीतितम्‌ । तन्माने साथिदाचूर्ण-नेंवेध व सुरेशारि॥ बिल्वपर्त तथा एप्प दद्यादशेत्तरं शतम । शांतिकादो द्ोणपुप्पं बबेश चाभिचारके ॥ स्तम्मने मोहने चेवे घन्तर कमकाह्यम । विद्वेषोच्वाटने देवि विंजयाप्य- पराजिता ॥ चत॒दृश्यां तमारभ्य यावरन्या चह्॒शी॥ एकूक कमझो लिग॑ पूजयेद्रक्तिभावतः । अशापक- सहझ्लं तु जप कुर्यादिनोदिने ॥ उत्ाहे सत्त- किड्लानि




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