साकेत - सन्त | Saket - Sant

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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> संदती दै तो रस्य खुल लता दै! ख य न्यास জী জিকা ह, उसकी समृद्धि द क्रि लिये; लर निज ऋय के वरस क पाता हैं. बना विश्व जयः स्वै विकल विललाता, द| = आ्वीयता की अव्य स्प अर कर आरत भरतस गाता. हैं. १0 सपमी एकं सम॑ ह, उन्हीं. की আজ विष्व य जन में जनादेन की व्योति निस्य जागी दें. सीर अलु इस. भांति जिसकी ই हुई) चवर जगत बही तो बड़भागी हे) चह का व त्यागी है.)




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