पदार्थ शास्त्र | Padartha Shastra

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Padartha Shastra by पं० आनन्द झा - pt. Anand jha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पदार्थ-शास्त्र पदार्थ मनुष्यों की तो वात ही यया छोटे-छोटे प्राणी कीट-पतग तक में मी पु गमस अवइय रहती है। अपने जीवन-निर्वाट के लिए अपेक्षित ज्ञान उन्हें मी होता है अन्यया उन्हे इस्‍्छा न होगी फिर जीवनयारण के लिए अपेक्षित साधर्नों में प्रवृत्ति न हो सकेगी । वयोकि वस्तु को जामें बिना उसके लिए इच्छा नहीं होती और इच्छा के बिना कमी प्रवृत्ति नही होती यह बात निश्चित है । अतः यह मानना हो पड़ेगा कि ज्ञान प्रत्येक प्राणी को होता है । विषय के बिना ज्ञान कभी नहीं होता । साघारण छोग मी कहा करते है वे इस विपय के अच्छे ज्ञाता है उन्हे इस विपय का अच्छा ज्ञान है वे इस विपय को विल्वुल नहीं जानते इत्यादि । अत यह मी मानना पड़ेगा कि यदि ज्ञान है तो उसका विपय भी है । उसी विपय को वस्तु पदार्थ आदि सन्ना कहों जाती है क्योकि ऐसा मी कहा जाता है कि वे इस वस्तु के अच्छे ज्ञाता है उन्हें इस वस्तु का अच्छा ज्ञान हूँ वे इस वस्तु वो अच्छी तरह जानते है । अथवा वे इस पदार्थ के अच्छे ज्ञाता नही है उन्हें इग पदार्थ का भच्छा ज्ञान नहीं है वे इस पदार्थ रो विस्वुल नहीं जानते इत्यादि । वस्तुओं को पदार्थ इसलिए कहते हैं कि संसार की ऐसी कोई भी चीज नहीं जो किसी दब्द से अभिहित न हो जिसकी कोई सन्ञा अर्थात कोई नाम न हो जो किसी नाम से निर्धारित न की जा सकती हो । अत ज्ञान का विपय वननेवाली सभी वस्तुओं को पदार्थ कहा जाता हू । पद जर अर्थ इन दो दव्दों के योग से पदार्थ दव्द की निप्पत्ति होती है । पद है नाम ओर अर्थ है उसका चाय अर्थात कसी दाव्द से कही जाने वाली वस्तु ही पदार्थ है । जैसे पुप्प झव्द है पद और सुगस्व आदि रवमाववाली बरतु है उसका अ्थ । अत. वह फूल पदार्थ कहा जायगा । इस प्रकार संसार की जो भी वरतुएँ है जो किसी मी ज्ञान का विपय होती है वे समी पदार्थ है ॥




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