योगशास्त्रान्तर्गत धर्म्म | Yogshastrantargat Dharm

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Yogshastrantargat Dharm by ठाकुर प्रसिद्धनारायण सिंह - Thakur Prasidh Narayan Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चरम थ् का € मकान सतत होगा । यह वास सत्य है कि किसी जनता का का्यून उस जनता की सर्वोत्तम सदाचार सम्बन्धी साधारण भावना का आदर है परन्तु भावना कानून की अपेक्षा शीघ्रतर परिवार्तित हो जाती है और कानून सवेदा काठ की गति में भें घुरे के विवेक के विपय में साधारण अनता की भावना की अपकषा थोड़ा पीछे रहता है । और मनुष्य के वनाये कानूनों में अनेक छिद्र रहा करते हैं और चाठाक कानूनोस्ठंघन करने वाला वाजिय की वर्तमान भावनाओं के विपरीत कोई भी वड़ा अपराध कर सकता है; यदि वह बड़ी ही होशियारी से करे । कुछ मजुष्य अपनी आप सदाचार सस्वन्धी संहिता रखते हैं. जिसका सार यह होता है कि यदि कालून के पंजे सें गिरफ्तार न हो तो कोई कार्य अललुचित नहीं हैं और इसछिये वे लायक चकीलों की सद्दायता से तढ्वीरें सोचा करते हैं कि कैसे कानून के चगुछ से बच कर अपना सतलव द्ासिछ करें । काचून के चेु का झरय न रहे तो उनका अन्त:करण निद्देन्द्र रहता है। यद्द आ- वयरण की बहुत आसान और सादी युक्ति उन लोगों के छिये है, जो इसके नीचे रह सकते हैं । जस्टीनियन ने, जो बड़ा भारी रोमन क्वादून चनानेवाठा था, साजुपी “कानून की सारी युक्तियों को तीन अ्रधान बातों में संक्षिप्त कर दी थीं कि “ईमानदारी से जीवच व्यतीत करो, किसीको क्षति न पहुँचाओ और प्रत्येक मनुष्य से उक्ण रहो” । यद्द बहुत दी सरछ और सुन्दर संहिता है, और यदि मनुष्य जाति इंमानदारी से इसका बतोब करती तो सारा संसार एक ही दिन में निर्दों दो जाता,' परन्दु ्रत्येक मनुष्य इन तीन शिक्षाओं में से प्रत्येक पर




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