हम क्या करें | Ham Kya Karen

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Ham Kya Karen by

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जीवन का अधिकांश भाग देहात में व्यतीत करने के बाद ाख़िर- कार सच १८८१ में मास्को में निवास करने के लिए मैं श्राया और उस नगर की हद से बढ़ी हुई दरिद्रता को देखकर मैं दुःखित श्रौर चकित हुआ । वैसे तो देहात के ग़रीब आदमियों के कष्टों से मैं भली-भॉति परिचित था किन्तु मुझे इसका ज्ञरा भी ख्याल न. था कि नगरो में उनकी कैसी दु्देशा है । मास्को की किसी भी सडक से कोई मनुष्य युज़रे उसे एक विचित्र घरकार के भिखारी मिलेंगे । कोली लेकर ईसा के नास पर देहातों में भीख मॉगने वाले भिखारियो से वे बिलकुल सिन्न होगे । मास्को के भिखारी स तो कोली लेकर चलते हैं श्रौर न भीख मॉगते हैं | प्रायः जब वे किसी से मिलते हैं तो उसकी आँख से श्राँख सिलाने की कोशिश करते हैं और उसके सुख का भाव देखकर उसके श्रनुसार व्यवहार करते हैं । मैं इस प्रकार के एक मिखारी को जानता हूँ--वह एक सद्गहस्थ है चुद है धीरे-धीरे चलता है और दोनों पैरों से लैंगडाता है । जब कोई पास से निकलता है तो वह लेंगडाकर चलता है ग्रौर सलाम करता है । यदि जानेवाला ठहर जाता है तो वह श्रपनी टोपी उतार लेता है फिर सुककर सलाम करता है श्रीर मॉगता है । यदि वह झादमी नहीं ठदरता है तब कुछ नहीं वह केवल लेंगढ़ाने का बहाना करता हे और उसी तरह लेंगडाता हा चलता रहता है । यह मास्को के एक श्रसली शोर अनुभवी सिद्क का नमूना है।




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