नारीदेहतत्व | Nari Dehatatv

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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परिच्छेद ४. (१९9 चतुर्थपरिच्छेद । सदवास । इश्वरकी असीम सामध्यंसे इसमकार आश्वयभावसे मनुष्यका जन्म भकरण स्थिर हुवाहै । मनुष्यजाति नष्ट न होजाय. इसलिये उसने मय वृ्तियोंकी अपेक्षा मनुष्यके हृदयें कामदानि अधिक नेज कीट । मनृष्यके ध्वंसके छिये अनेक उपायदें. अनेक उपायसे मनुष्य मरताहे, अतिपृहूर्ची मनुष्य मरसकताहै. इसप्रकारकी अदस्थामें कामको इतना मवठ न करनेमे एकदिन मनुष्य जातिका लोप होजाता । जो जो भंग इश्वरने डसकायेगें नियुक्त रकसेहें; उनकी गठनपरणाठी ऊपर संपंपसे लिखी गईहडे । किन्तु वह उस उस अंगमें उत्पन्न हुवा वह इकडां ने होनेसे मनृष्यका जन्म नहीं होता । मनुष्य जातिका लोप न होजाय, इस कारणदी मनु- 'प्यके दृदयं सी पुरुप--के सहवासकी इच्छा इननी पबलहे । । कर पहिंटेते! हम यही लिखेंगे दिए, स्वाभादिक सहवास किसको ।फहोंदं । फिर किम अवस्थामें सहवास करना कर्चेव्यहे, सहयासकी / शपिकता ओर अल्पताने कया हानि होतीहे, इत्यादि दिपय 2पीऐ दिखेंगे । * दावों कासदान परप अपेका बहुत कम । कनुव कड़े दिन परे >तवार पद ट्नितय: उन बामसदोति मदल रहती, इसके पाछे एकराररी नहीं गाने शोर पिना उसेजित परनेरी च्टा वियुए उलेजित नहीं होनी । > उपर कृष्ण चर पदन्दचस लिलिय थे पके का हे, (उचुना हा,




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