नारी - जीवन | Nari -jivan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भारतीय नारी ] [६ दूषित रहा । जहा दो चार वर्षों की उम्रवाली कन्याश्रो के विवाह होने लगे, वहा श्राठ-दस वष की उम्र वाली विधवाशों की कमी न रही । जिस श्रवस्था मे वे दूधमु हो भ्रवोध बालिकाएं सरलता- वश विवाह को समझती भी नहीं, उसी उम्र मे उनका विधवा हो जाना कितेना दयनीय होगा ! ऐसी परिस्थितियों मे प्राजन्म ब्रह्यचयं पालन भी श्रसम्भव है । ब्रह्म च्य कोई जबरदस्ती की वस्तु नहीं | मानव सुलभ भाव- नश्रो को तो नही दवाया जा सकता । जहा बडे भारी तपस्वी सदाचारी विश्वामित्र भो मेनका के समक्ष कामवासना को वश मे ना कर सके, वहा इन भोली-भाली कन्याओ से क्या श्राणा कौ जा सकती है कि वे श्रपने सदाचरण द्वारा अपने हृदय को पवित्र व निष्कलक रख सकं । परिणामस्वरूपःसमाजमे दुराचार वं वेश्यावृत्ति बस्ने लगी । भ्राध्िक विषमता मी इसमे काफी घहा- यक रही । पहिले जत्र स्त्रिया सुशिक्षित तथा सुसस्ृत थी, वे विवा- हित जीवन तथा पतित्रत के आदर्श को समक कर उसके प्रननुसार झ्राचरण करने का पूर्णो प्रयत्त करती थी । उसी के फल-स्वरूप पति को मृत्यु के उपरात अपने जीवित रहने की भ्रपेक्षा मृत्यु का भ्रालिगन श्रधिक उपयुक्त सम कर श्रपते आपको श्रग्नि मे जला कर भस्म कर देती यी । यद्यपि यहु धारणाया प्रथा घोर भ्रज्ञान का ही फल थी, मगर वित्कूल स्वेच्छासे थी । क्रिसी भी प्रकार की जवदंस्ती इस सम्बन्व मे करना प्रनुचित तमा जाता था । क्योकि जवर्देस्‍ती किसो स्त्री को जल मरने के लिए बाध्य करना मानवहिसा से किसी भी हुलत मे कम न था । पर घीरे-धीरे लोग पाशविक्ता कौ सीमा का भी उल्लघन कर बैठे । पति की




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