गृहस्थ योग | Grahasth Yog

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Grahasth Yog by पं० श्रीराम शर्मा आचार्य - pandit shree sharma aachary

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जन्म:-

20 सितंबर 1911, आँवल खेड़ा , आगरा, संयुक्त प्रांत, ब्रिटिश भारत (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत)

मृत्यु :-

2 जून 1990 (आयु 78 वर्ष) , हरिद्वार, भारत

अन्य नाम :-

श्री राम मत, गुरुदेव, वेदमूर्ति, आचार्य, युग ऋषि, तपोनिष्ठ, गुरुजी

आचार्य श्रीराम शर्मा जी को अखिल विश्व गायत्री परिवार (AWGP) के संस्थापक और संरक्षक के रूप में जाना जाता है |

गृहनगर :- आंवल खेड़ा , आगरा, उत्तर प्रदेश, भारत

पत्नी :- भगवती देवी शर्मा

श्रीराम शर्मा (20 सितंबर 1911– 2 जून 1990) एक समाज सुधारक, एक दार्शनिक, और "ऑल वर्ल्ड गायत्री परिवार" के संस्थापक थे, जिसका मुख्यालय शांतिकुंज, हरिद्वार, भारत में है। उन्हें गायत्री प

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १७ 3 मनोविज्ञान शास्र फे यशस्त्री आाचाये छाक्टर फ्राइड, डाक्टर घ्राइन, ढाक्टर दनें प्रडति दिद्वानों का मत है कि चास- नायें कुचली जाने पर सुप्त मन फे इसी कोने में एक बढ़ा घाब लेकर पढ़ रइती दै भीर जब भवसर पादी दें. तभी भयानक शारीरिफ या मानसिक रोगों को उत्पन्न फरती हूँ । उनका कद्दना है कि पागलपन, मूजों, उसी, सन्माद, श्रम, नाढ़ी संस्थान ,का मिक्षेप, हनिद्रा, कातरता झादि झनेक रोग बासनाओं के षनुचित रीति से फुचले जाने फे कारण उत्पन्न दोठे हैं । इस- लिये श्रह्मचर्य फी पहली शर्तें मन का स्यिरता” मानी गई दे । जिनका मन किन्दीं उत्तम विचारों में निमप्न रहता दे; दिपय यूत्तियों फी शोर जिनका ध्यान दी नहीं जाता या नाता दे हो तुरन्त दो श्ररुचि श्रोर घृणापूर्वक वहाँ से हट जाता है ने ही पप्चारी दै। जिनका मन वासना में भटकता है, चित्त पर जो फायू रख नहदीं पाते बनके शारीरिक श्रझ्चयं को विडम्चना ही कद्दा जासफता है | क र किसी स्रोत में से पानी का प्रवाद ज्ञारी हो कित्सुर सके धाद फे सार्ग को रोक दिया जाय ठो षद्द पानी जमा .द्ोकर फिसी दूसरे सागे से फूट निकलेगा । मन से दिपय चिन्तन और थार से अद्यचये यह भी इसी प्रकार का कांये है। मत में बासना उत्पन्न होने से जो उत्तेजना पैदा होती है घहद फूट निक- लने के लिए कोई न कोई मार्ग दूं उती हैं । साधारण मार्ग बन्द दोता है तो कोई धौर सार्ग॑ थना कर घड़े निकलती है। यह नया मार्ग घपेशषा कृत बहुत स्यतरनाक चर हानिकारक साधिव होता हैं। कं ्‌ संसार भर को जन गणना की रिपोर्टों का वलोकन करने से यद सचाई भर सी भधिक स्प्र रूप से प्रकट हो जाती




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