आदर्श बालक | Adarsh Balak

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Adarsh Balak by आचार्य चतुरसेन शास्त्री - Acharya Chatursen Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्श दौर बादल क्रोध से थरथर काँपले हुए पालकी के सुनहरी काम के पढ़ें की ओर झम्निमय नेत्रों से देखते हुए कहा । के पर्दा हिला श्ौर चादल ने सुँड निकाल कर कहा-- काका जी सावधान / कौन तुम हो वादुल जी हाँ और सातसौ डोलियों मे जुकाऊ बीर भरे है दम सुन्नतान से निवट लेगे । वार गोरा काका घोड़ लिए खडे हैं शाप घोड़े पर चढ़ किले मे जा पहुँचे । और फिर सेना लेकर सुल्तान की सेना पर टूट पढे त 1 तक हम निवट लेगे। लीजिए तलवार ? के शाबाश बेटे दम झाज दूगावाजी का ... ८८८ प्युप ...... ज्यादा चाते न कीजिए । खीसे के पीछे घोड़ा खडा हैं ाप जाइये। हम शत्रुओं को रोकते है. । बादल पालकी से निकल कर खड़ा हुआ सकेत होते ही हजारों राजपूत हर-हर करके तलवार सँतकर निकल पड़े। रह-मे-भद् पड़ गया | छावनी में उथल-पुथल मच गई | जो जहाँ था चहीं काट डाला गया । तैयारी का अवसर ही न था मारो-मारो की आवाज ही सुनाई पढ़ती थी घायलों की चीत्कार मरते हुआओं की कराइने की छावाज और राजपूतों की हुर-दृर महादेव तथा पठानों की अल्लाहदो-अझक्रचर की तुमुल-ध्वनि हो रही थी सरड मुर्ड कट-कटकर गिर रहे थे । राग्गा भीमसिंद तीर की भॉति क्लि वी शोर जा रहे थे किले पर




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