पद्म पुराण | Padam Puran

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एक विचार :

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पं. दौलतराम जयपुर की तेरहपंथ शैली में एक समादृत विद्वान थे। उन्होने वि॰सं॰ १८२३ में 'पद्मपुराण' नामक हिन्दी ग्रन्थ की रचना की जो पद्मपुराण के मूलश्लोकों का यह अनुवाद है। वे आधुनिक मानक हिन्दी के आरम्भिक साहित्यकारों में गिने…

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(४) पख सं० विषय पृष्ठ सं० ६६ छयासठवां पवे--रावणुके दूतका आने और लोटकर जानेका वण न ४६३ ६७ सड़्सठवां पे--श्री शांतिनाथ के चेत्याल्लय- कावणन दृऊ इ८ चढ़ सठवां पव--श्री शांतिनाथके चेत्यालय में बघान्हिका उत्सबवका। वर्णन ४६६. ६४ उनहत्तर वां पत्र--लंकाके लोगोका अनेकानेक नियम घारण वर्णन ७० ७० सत्तरवां पब॑--रावणका विद्या साधना झोर कपिकुमारनिका लंका गमन बहुरि पूर्ण भद्र मणशिभद्रका कांप शांति वण ने ७१ ७? इकत्तरवां पवे श्री शांतिनाथ के मर्दिर में रावणकों बहुरूपिणी विद्याके सिद्ध होनेका वर्णन ४७४ उन बहत्तरवा पव-रावणुक युद्धका निश्चय करनेका वणेन जप ७३ तिहत्ततरवां पव॑-रावणका युद्धबर्षें उद्यमी होनेका चेन ४८१ ७४ चौहत्तरवां पब॑-रावण लइमण्पका युद्ध बवणन छप६ ७५ पिचहत्तरवा पव -लच्मणु+ चक्ररत्नकी प्राप्तिका चरॉन ४४३ ७६ छिहततरवां पव-रावणका बघ वर्णन... ४४६ ७७ सत्तत्तरचां पच॑-बिभीषणका शोक निबारणुव्णेन ्ध्प उप श्ठत्तरवां पवे-इ द्रजीत कु'भकरणादिका बैराग्य और मंदोदरी आदि राशियोंका बैराग्य बणन श०१ ७६ उन्यासीवां पब-राम श्र सीताका मिल्ञाप वणन द०७ ८० 'अरसीवां पवे-श्री मयमुनि माहात्म्य बन ५१० ८१ इक्यासीवां पव॑-अयोध्या नगरीका वर्णन ४१६ परे बियासीवां पब॑-राम लक्ष्मणुका झागमन ५४२३ पड़े तिरासीवां पव॑-त्रिज्ञोकमंडन ह्थीका जातिस्मरण होयकर उपशांत होनेका बणेन ४२६ प॥बें सं ० विषय पृष्ठ सं० पदष्ठ चौरासीवां पवे-त्रिलोकमंडन हाथी का वैराग्य वर्णन ५३२ ८५४ पचासीवां पव-भरतके और हाथीके पू्वे- भव वणेन ३३ घद छियासीवां पव--भरत और कैकेईका वेराग्य वरोन ४४० ८७ सत्तासीवां पर्व -भरतनिर्वाणगमन बणंन ५४१ प्प 'अट्टासीबां पच--रामलदमणका राज्या- मिषेक वर्णन ८६ नबासीवां पवे--मधघुशा युद्ध अर बैराग्य अर मधघुराजाके पुत्र लव णुका मरण वणणन ५४५ ६० नव्बेवां पब --मथुराके लोकनिकू' असुरे द्र शेर कृत उपसरग वण न ५० # १ इक्यानवेवां पवे--शत्रु घ्नके पूवभवका बणेन ५५ ६२ बानवेबां पब--मधथुराके उपसगंका निवारण वर्णन ६३ तिरानवेवां पबें-रासकों श्रीदासाका लाभ और लचमणकू मनारमा लाभ बणन .. ५४५७ ६४ चौरानवेवां पवे - राम लच्मणकी ऋद्धिका वबणन ६४ पिचानवेवा पव॑--जिनेन्द्रपू जा की ' सीताकों मिलाषा गभ का प्रादुभाव बर्शन ४६१ ६६ छयानवेवां पबें-रामको लो कापव।दकी चिंताका बणन ६४ सत्तानवेवां पब-सीताका बनबिषे मिलाप अर वज्जजंघका झागमन वण न ६८ झट्टानवेवां पब॑- सीताकू' बद्अजंघका पेय बंघवानेका वण न ६६ निन्यानवेवां पब॑--रामकू' सीताका शोक वण न १०० एक सौबां पब--लवखणांकुशके पराक्रमका का वरौन पट १०१ एकसौ एकबां पवे--लवणांकुशका दिग्विजय बणन शपप श्श शअ. भद्दे श्प््‌ श्जडे कह,




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