कल्याण | Kalyan

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Kalyan  by चिम्मनलाल गोस्वामी - Chimmanlal Goswamiहनुमान प्रसाद - Hanuman Prasad

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चिम्मनलाल गोस्वामी - Chimmanlal Goswami

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हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar

He was great saint.He was co-founder Of GEETAPRESS Gorakhpur. Once He got Darshan of a Himalayan saint, who directed him to re stablish vadik sahitya. From that day he worked towards stablish Geeta press.
He was real vaishnava ,Great devoty of Sri Radha Krishna.

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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देर # पुराण परमाजेय न्रह्मथिधासर परम्‌ # [ अच्याय गे०४ दो सो चारवोँ अध्याय धर मासापबास-ब्रत अम्लिदेव कहते हैं--मुनिश्नेष्ठ वसिष्ट ! अय मैं तुम्हारे सम्मुख सबसे उत्तम मासोपबास-श्रतका वर्णन करता हूँ । वैष्णव-यशका अनुष्ठान करके; आचार्यकी आजा लेकर; कृच्छू आदि श्रतोंसे अपनी शक्तिका अनुमान करके मासोपवास- श्रत करना चाद्यि । वानप्रस्थः संन्यासी एव विधवा स्त्री- इनके लिये मासोपवास-ब्रतका विधान है ॥ १ २ ॥| आधिनके झुक्क पक्षकी एक्रादशीको उपवास रख्वकर तीस दिनोंके ल्यि निम्नलिखित सकल्प करके मासोपवास-ब्रत प्रहण करे--भश्रीधिष्णो ! में आजसे लेकर तीस दिनतक आपके उत्थानकालप्यन्त निराददार रदकर आपका पूजन करूँगा । सबब्यापी श्रीहरे ! आधिन झुक्क एकादशीसे आपके उत्थानकाल कार्तिक झुक्क एकादशीके मध्यम यदि मेरी ग्रत्यु हो जाय तो ( आपकी कृपासे ) मेरा त्रत भट्ट न दो# ।' श्रत करनेवाला दिनमें तीन वार खान करके सुगन्धित द्रव्य और पुष्पोंद्वारा प्रातः मध्याह्म एव सावंकाल श्रीविष्णुका पूजन करे तथा बिष्णु-सम्बन्धी गानः जप ओर ध्यान करे । ब्रती पुरुष बकवादका परित्याग करे और धनकी इच्छा भी न करे । वह किसी भी ्रतहीन मनुष्यका स्पर्श न करे और शाख्रनिषिद्ध कर्मोमे लगे हुए लोगोंका चालक--प्रेरके न बने । उसे तीस दिनतक देवमन्दिरमें ही निवास करना चाहिये । ब्त करनेवाला मनुष्य कार्तिकक झुक्कपक्षकी द्वादशीको भगवान्‌ श्रीविष्णुकी पूजा करके ब्रांझणोंको भोजन करावे । तदमन्तर उन्हें दक्षिण देकर और स्वय पारण करके ब्रतका विसर्जन करे । इस प्रकार तेरह पूर्ण मासोपवास-ब्रतोंका अनुष्ठान करनेवाल्म भोग और मोक्ष--दोनोंको प्राप्त कर लेता है ॥२-९॥। ( उपयुक्त विधिसे तेरह. मासोपवास-ब्रतोंका अनुक्ान करनेके बाद रत करनेवाला श्रतका उद्यापन करे । ) वह वैष्णव- यश करावे: अर्थात्‌ तेरद आराह्मणोंका पूजन करे । तदनन्तर उनसे आशा लेकर किसी ज्राह्मणको तेरह ऊर्ध्वव्तरः अधोषस्र) पात्र: आसन» छत्र: पवित्री: पादुकाः योगपट्ट और यशोपवीतों- का दान करे ॥ १०-१२ ॥ तत्पश्चात्‌ शय्यापर अपनी और श्रीविष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमाका पूजन करके उसे किसी दूसरे ब्राझणकों दान करे एव उस ब्राझ्मणका वस्त्र आदिसे सत्कार करे । तदनन्तर श्रत करनेवाला यह कददे--्मैं सम्पूण पापोंसे मुक्त होकर आइाणों और श्रीविष्णु भगवान्‌के कृपा-प्रसादसे विष्णुलोकको जाऊँगा । अब मैं विष्णुस्वरूप होता हूँ. ।* इसके उत्तरमें आझणोंको कहना चाहिये--'देवात्मन ! तुम विष्णुके उस रोग-झोक- रहित परमपदकों जाओ-जाओ और वहाँ विष्णुका स्वरूप धारण करके विमानमें प्रकादित होते हुए स्थित होओ ।? फिर श्रत करनेवाला द्विजोको प्रणाम करके वह शब्या आचार्यकों दान करे । इस विधिसे ब्रत करनेवाला अपने सो कुछोंका उद्धार करके उन्हें विष्णुलोकमे ले जाता है. । जिस देशमें मासोपवास-ब्रत करनेवाला रहता है; वह देश पापरहित हो जाता है । फिर उस सम्पूर्ण कुलकी तो बात ही क्या है; जिसमें मासोपवास-त्रतका अनुष्ठान करनेवाला उत्पन्न हुआ होता है । श्रतयुक्त मनुष्यको मूर््छित देग्वकर उसे घरतमिश्रित दुग्धको पान कराये । निम्नलिखित वस्तुएं श्रतकों नष्ट नहीं करतीं--न्राझणकी अनुमतिसे अरहण किया हुआ हृविष्य; दुग्थ; आचार्यकी आज्ञासे छठी हुई ओषधिः जल; भूल और फल । इस ब्रतमें भगवान्‌ श्रीविष्णु ही महान ओषधिरूप हूं--इसी विश्वाससे ब्रत करनेवाछा इस ब्रतसे उद्धार पाता है ॥ १६-१८ ॥ इस प्रकार आदि. आग्नेय महापुराणमें «्मासीपदास-ब्रतका बणन नामक दो सौ चारबां अध्याय पूर हुआ ॥ २०४ ॥ आर दर. # अथप्रदृत्यद॑ विष्णों यावदु्यानक तव । अर्चये त्वामनदनन्‌ू दि. यावलिंशदिनानि तु ॥ कार्तिकाश्विनयोविंष्णो थावदुरवानक तब । श्रिये यथन्तरालेड ब्रतभन्ञो न मे भवेत्‌ ॥ ( मप्नि+ २०४ | न ण )




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