गीता हमें क्या सिखलाती है | Geeta Hame Kya Sikhalati Hai

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
1.25 MB
कुल पष्ठ :
62
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)गीता हमें क्या सिखलाती है थ्
नफैलाया है, उसको अपने-करव्य से ऐूंजकर मतुष्य सिद्धि को
पाप्त होता है ।
१-वर्णोंचित दुसरे कर्तव्य के साथ वैदिक यज्त,जिनने कि
मनुष्य का कत्याण अभिमेत है 'वदद भी पुरुष के 'छिये अंप्रदेय
जनुपेय हैं।-
यज्नशिष्टाशिन: सन्तो सुच्यन्तें से किल्विष 1,
भुझ्ते ते खे पापा ये -यचन्त्या्मकारणातू ॥ २! 3
जो यश का घचा हुआ अन्न खाते हैं, बह सारे पापों से
छूट जाते हैं, पर बह पापी निरा पाप खाते हैं, जो अपने दी निमित्त
पकाते हैं।
अन्नाद भवान्ति भ्रतानि पजन्यादन्नसभव: ।
' यज्नादू भवंति प्जन्यो.यज्नः कर्मसमसुद्धव:..॥ रै। १४
कम बहने विद बह्माक्षरसमुद्वमू । -
तस्मात् स्वगते अहम निर्ये ये प्रातिथितमु॥ १५९
: एवं प्रवर्तितं चक्क॑ नाजुवर्तयतीह यः
अधायुरिन्ियारामो मो पार्थ स जीवति ॥ १६
सब माणधारा अन्न से उत्पन्न हाते हैं,अन्न मघ से उत्पन्न होता
हैं, मंघ यज्ञ से उत्पन्न हाता हैं, यज्ञ कम है उत्पन्न हाता दे | ४
कम को वेद से उत्पन्न हुआ जांन,ेद अविनाशी(परमात्पा)ते उत्पन्न
हुआ है, इसलिये सर्वव्यापक ब्रह्म यज्ञ में सदा स्थित हे ( अर्थात्
. यह करने वछि पर अपना स्वरूप मकाश करता है ) । १५। हे
जजुन ! इसप्रकार के चढाये हुए श्वक्क का जो(पुरुष) अनुसरण नहीं
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