रस सिध्दान्त | Ras Siddhant

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
शेयर जरूर करें
Ras Siddhant by डॉ. नगेन्द्र - Dr.Nagendra

एक विचार :

एक विचार :

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

डॉ. नगेन्द्र - Dr.Nagendra के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
ख रस-सम्प्रदाय का इतिवृत्त रस-सिद्धान्त का प्रतिपादक प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ नाट्यशास्त्र है जो भरत मुनि की रचना के रूप में प्रसिद्ध है । इसमें नाटक के संदर्भ में रस के अंग-उपांगों का पर्याप्त विस्तार से विवेचन किया गया है । विशेषज्ञ विद्वानों का मत है कि अपने वर्तमान समग्र रूप में नाट्यशास्त्र ईसा की छठी शती से पु की रचना नहीं हो सकता--साथ ही इसके बहुत बाद की भी रचना यह नहीं है क्योंकि नाट्यशास्त्र के जिस संस्करण पर परम- माहेइवर अभिनवगुप्त ने आठवीं-नवीं झती में अपनी प्रसिद्ध टीका अभिनवभारती लिखी है वह प्रस्तुत संस्करण से प्राय अभिन्न ही है । किन्तु यह तो हुई नाट्यशास्त्र के वर्तमान संस्करण की वात जो विद्वान्‌ इसे छठी शत्ती के आस-पास की कृति मानते हैं वे प्राय यह भी स्वीकार करते हैं कि इस नाट्यशास्त्र का आधारभूत एक लघुतर संस्करण भी प्रारम्भ में था--भाज मूल और उसके विस्तार में भेद करना सरल नहीं है परन्तु उसके चिह्न मिल ही जाते हैं। यह भरत की रचना थी और कदाचित्‌ सुत्र-रूप में -थी--कालिदास इसी रूप से परिचित थे । अत इसकी रचना का समय ई०पू० दूसरी शती से ईसा की दूसरी शती तक माना जा सकता है । इस लघुतर संस्करण में प्राय समस्त मौलिक नाट्यांगों का विवेचन था--रस-प्रसंग की विवेच्य वस्तु और शैली दोनों के ही आधार पर यह धारणा दृढ़ हो जाती है कि रस का भी अन्तर्भाव निश्चय ही इसमें था । निष्क्प यह है कि रस-सिद्धान्त का विस्तृत शास्त्रीय विवेचन मूल भरत-सूत्रों में ईसा के जन्म के एक-दो दझाती इधर या उधर निद्चित रूप से हो चुका था । इससे पहले का कोई विवेचन उपलब्ध नहीं है । किन्तु प्रश्न उपलब्धि का ही है अस्तित्व का नहीं है । भरत से पूर्व रस-सिद्धान्त का आविर्भाव हो चुका था इसमें भी सन्देहू नहीं किया जा सकता । एक तो भरत-सूत्रों सूलसुत्रों का भी का रस-प्रतिपादन इतना सांगोपांग और पूर्ण है कि उसके पीछे एक विस्तृत विचार-परम्परा की कल्पना अनिवायें है दूसरे नाट्यशास्त्र में सवंत्र उद्धत आनुवंश्य इलोक अपने आप में इस वात का अकाट्य प्रमाण हैं कि भरत से पूर्व शिष्य-प्रद्िष्य-परम्परा के माध्यम से रस-सिद्धान्त काफ़ी पहले से ही चला आ रहा था । अभिनवगुप्त के साक्ष्य के अनुसार पुर्वाचार्यों ने लक्षण रूप में इनका कथन किया था और भरत ने परम्परा से प्राप्त कर इन्हें अपने विवेचन को पुष्ट करने के लिए यथास्थान निवेशित कर दिया है ता एतां ह्यार्या एकप्रघट्रकतया पुर्वाचार्येलंक्षणत्वेन पठिता । सुनिना तु सुखसंग्रहाय यथास्थानं निवेशिता । अभिनवभारती अ० ६ दर राजशेखर के प्रसिद्ध उद्धरण में भी भरत के अतिरिक्त नन्दिकेशवर का उल्लेख है । उसके अनुसार भरत ने मुख्यतया रूपक का निरूपण किया और नन्दिकेद्वर ने रस का-- भर्थात्‌ भरत की अपेक्षा नन्दिकेदवर का रस-सिद्धान्त से घनिष्ठत्तर सम्बन्व था 1 १. वृस्तुतः सून्न-शंली का प्रयोग इसी प्रसंग में सवोधिक सष्ट है. |




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :